Tuesday , 8 September 2026

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पेंटागन का बड़ा फैसला: अब जमीन के नीचे शिफ्ट होंगे अमेरिकी सैन्य ठिकाने, जानें क्या है अमेरिका की नई सीक्रेट स्ट्रेटजी

नई दिल्ली। मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिका और ईरान के बीच गहराता संघर्ष अब केवल मिसाइलों और ड्रोन हमलों तक सीमित नहीं रहा है। क्षेत्र में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों, सैन्य अड्डों और खुफिया नेटवर्क पर मंडराते प्रत्यक्ष खतरे को देखते हुए वाशिंगटन ने अपनी सैन्य रणनीति में बड़े और अभूतपूर्व बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है। छह सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) बेहद गुपचुप तरीके से अपनी खुफिया क्षमताओं और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा की व्यापक समीक्षा कर रहा है।

11 सितंबर के बाद बिछाया गया था खुफिया नेटवर्क

11 सितंबर 2001 को हुए आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने सैन्य और खुफिया बुनियादी ढांचे का भारी विस्तार किया था। इसके तहत इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान, यमन और लीबिया सहित आधा दर्जन से अधिक देशों में स्थायी सैन्य ठिकानों और सर्विलांस नेटवर्क का एक मजबूत जाल बिछाया गया था। हालांकि, हाल के महीनों में ईरानी मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन द्वारा अमेरिकी अड्डों को लगातार निशाना बनाए जाने और 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद इस विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर की गंभीर कमजोरियां उजागर हो गई हैं।

अंडरग्राउंड ठिकानों में शिफ्ट करने की योजना

मामले से जुड़े दो वरिष्ठ सूत्रों ने खुलासा किया है कि अमेरिका अब अपने कुछ सबसे संवेदनशील सैन्य और खुफिया ठिकानों को जमीन के नीचे (Bunkers/Underground facilities) स्थानांतरित करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। रणनीति यह है कि यदि ईरान के साथ यह संघर्ष कई महीनों या वर्षों तक खिंचता है, तो घातक बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों से अमेरिकी सैनिकों और आधुनिक उपकरणों को सुरक्षित रखा जा सके।

50 हजार अमेरिकी सैनिक सीधे निशाने पर

कतर का अल-उदीद एयर बेस (Al Udeid Air Base), बहरीन में स्थित अमेरिकी नौसेना का 5th फ्लीट बेस, कुवैत और जॉर्डन के प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठान अमेरिकी अभियानों की रीढ़ माने जाते हैं। वर्तमान में इस पूरे क्षेत्र में अमेरिका के करीब 50,000 सैनिक, एयर डिफेंस यूनिट्स और नौसैनिक बल तैनात हैं। मौजूदा संकट ने इन मजबूत ठिकानों को ईरान के लिए आसान और संभावित निशाना बना दिया है। जुलाई में जॉर्डन में हुए ईरानी हमले में भी दो अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौत की पुष्टि हुई थी।

कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और खुफिया तंत्र की चुनौती

रिपोर्ट्स के अनुसार, पेंटागन के अधिकारियों को मध्य पूर्व में अपने ठिकानों की ढांचागत कमजोरियों के बारे में पहले से जानकारी थी, लेकिन समय रहते इन पर कड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए। अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता अपने उस खुफिया और रडार सर्विलांस नेटवर्क को लेकर है, जिसके जरिए वह ईरान की मिसाइल गतिविधियों, ड्रोन लॉन्च और सैन्य हलचल पर चौबीसों घंटे नजर रखता है। यदि ये खुफिया केंद्र क्षतिग्रस्त होते हैं, तो अमेरिका की अग्रिम चेतावनी (Early Warning) क्षमता पूरी तरह ठप हो सकती है।

पूरा खाड़ी क्षेत्र बन सकता है युद्ध का मैदान

अमेरिका की सैन्य रणनीति में किसी भी संभावित हमले से पहले मिसाइल की दिशा और उसके लक्ष्य का सटीक पता लगाना सबसे महत्वपूर्ण होता है। कतर, कुवैत, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने इस संघर्ष को केवल वाशिंगटन और तेहरान के बीच सीमित नहीं रहने देते। ईरान द्वारा लगातार दी जा रही धमकियों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण अब पूरा खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) एक भीषण युद्धक्षेत्र में तब्दील होने की कगार पर खड़ा है।

Check Also

डूबने की कगार पर मुंबई और कोलकाता? संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: समुद्र और हिमालय ला सकते हैं महाप्रलय, 1.4 करोड़ लोग बेघर होने के मुहाने पर

ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया पर अब तक का सबसे बड़ा …