
ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया पर अब तक का सबसे बड़ा जल प्रलय मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने एक रोंगटे खड़े करने वाली चेतावनी जारी करते हुए आगाह किया है कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई और ऐतिहासिक महानगर कोलकाता सहित दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में बसे 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग स्थायी जलभराव के सीधे जोखिम में हैं। हिमालय के तेजी से पिघलते ग्लेशियर और रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रहा समुद्री जलस्तर इन घनी आबादी वाले महानगरों को इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन की ओर धकेल रहे हैं।
रिकॉर्ड गति से बढ़ रहा समंदर, जमीन धंसने से दोहरा खतरा
मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से 2023 के दौरान वैश्विक समुद्र स्तर औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा था, लेकिन हाल ही में यह रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गया है। मुंबई और कोलकाता जैसे घनी आबादी वाले तटीय शहरों में यह संकट इसलिए भी विकराल है क्योंकि यहां समुद्र का स्तर बढ़ने के साथ-साथ जमीन धंसने (लैंड सब्सिडेंस) की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए तो सड़कों, रेलवे ट्रैक, बंदरगाहों और प्रमुख बुनियादी ढांचों के जलमग्न होने का स्थायी खतरा पैदा हो जाएगा।
खारा पानी बिगाड़ेगा सेहत और खेती, गहराएगा पेयजल संकट
संयुक्त राष्ट्र ने साफ किया है कि यह संकट महज पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार, आजीविका और अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला है। समुद्र का बढ़ता दायरा मीठे पानी के भूमिगत स्रोतों में खारा पानी घोल देगा, जिससे शहरों और गांवों में गंभीर पेयजल संकट खड़ा होगा। उपजाऊ कृषि भूमि बंजर होने लगेगी और खाद्य सुरक्षा चरमरा जाएगी। इसके साथ ही, जलभराव और स्वच्छता नेटवर्क टूटने से जलजनित महामारियां फैलने की आशंका है, जबकि अपना घर खोने का डर लाखों लोगों को मानसिक अवसाद की तरफ धकेल रहा है।
हिमालय में ‘टाइम बम’ बनीं 47 से अधिक झीलें, अचानक तबाही का खौफ
संकट केवल समुद्र के किनारे तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय की चोटियों पर भी हालात विस्फोटक हैं। तापमान बढ़ने से पिघल रहे ग्लेशियरों के कारण विशालकाय ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो रहा है। भारत, नेपाल और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में 47 से अधिक ऐसी खतरनाक झीलों की पहचान की गई है, जो कभी भी टूट सकती हैं। यदि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटनाएं होती हैं, तो हिमालय से निकलने वाली नदियों के किनारे बसे लाखों लोगों के घर, खेत, पनबिजली परियोजनाएं और रोजगार कुछ ही घंटों में तबाह हो सकते हैं।
दुनिया की 10 फीसदी आबादी पर मंडराता साया, क्या है बचाव का रास्ता?
पूरी दुनिया में करीब 77 करोड़ लोग (वैश्विक आबादी का 10 प्रतिशत) ऐसे निचले तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, जो समुद्र के हाई-टाइड स्तर से 5 मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। अमीर देशों के लिए यह अरबों डॉलर का वित्तीय नुकसान हो सकता है, लेकिन दक्षिण एशिया के लिए यह मानवीय त्रासदी है, जहां छोटे मछुआरे और गरीब वर्ग सबसे पहले तबाह होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विभीषिका से बचने के लिए तत्काल प्रभाव से तटीय शहरों का ड्रेनेज सिस्टम सुधारना होगा, कड़े शहरी नियोजन नियम लागू करने होंगे, मैंग्रोव जैसे प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को बचाना होगा और संभावित विस्थापितों के लिए सुरक्षित पुनर्वास नीतियां बनानी होंगी।
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