Sunday , 12 July 2026

रूसी तेल पर भारत-चीन में ‘महायुद्ध’: होर्मुज संकट के बीच हर बैरल के लिए मची खींचतान, क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है?

नई दिल्ली। इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव ने वैश्विक भू-राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। मिडिल ईस्ट में मचे कोहराम के बीच अब ‘दोस्ती’ से कहीं ज्यादा ‘जरूरत’ का बोलबाला है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में ईरान की घेराबंदी और खाड़ी देशों के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हमलों ने दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई चेन को तोड़ दिया है। इसका सबसे बड़ा असर भारत और चीन पर पड़ा है, जो अब रूसी तेल के हर एक बैरल के लिए आमने-सामने आ गए हैं।

होर्मुज में सप्लाई ठप, मिडिल ईस्ट से तेल आना हुआ मुश्किल

ताजा मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध की आग ने मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल पर लगभग ब्रेक लगा दिया है। कल तक जो भारत और चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सऊदी अरब और इराक पर निर्भर थे, आज वे पूरी तरह रूस की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) को हासिल करने के लिए भारत और चीन के बीच छिड़ी यह जंग अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। हालत यह है कि जून में आने वाली तेल की खेपों के लिए दोनों देशों ने अभी से ही आक्रामक बोली लगाना शुरू कर दिया है।

आंकड़ों में गिरावट: होर्मुज से आने वाले तेल में भारी कमी

युद्ध से पहले के आंकड़े बताते हैं कि चीन होर्मुज के रास्ते रोजाना करीब 44.5 लाख बैरल तेल मंगाता था, जो अप्रैल में सिमटकर महज 2.2 लाख बैरल रह गया है। भारत की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है; भारत का आयात 28 लाख बैरल से गिरकर 2.4 लाख बैरल प्रति दिन पर आ गया है। इस भारी गिरावट ने भारत सरकार की पेशानी पर बल ला दिए हैं, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर ईंधन की कीमतों से जुड़ी है।

भारत का 30 दिनों का बफर स्टॉक बनाम चीन की मजबूत स्थिति

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय उसका रणनीतिक तेल भंडार (Oil Reserves) है। चीन के पास अपनी जरूरतों के लिए करीब तीन से चार महीने का तेल भंडार मौजूद है, जबकि भारत के पास केवल 30 दिनों का बफर स्टॉक है। गौर करने वाली बात यह है कि सरकार ने अब तक घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं, जिससे ईंधन की मांग में कोई कमी नहीं आई है। तेल की अनिवार्य जरूरत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की मोलभाव (Bargaining) करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है।

रूस का रुख और अमेरिकी पाबंदियों की चुनौती

रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने हालिया इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि रूस, भारत के साथ अपने तेल व्यापार को बढ़ाना चाहता है। उन्होंने पश्चिमी देशों और अमेरिका द्वारा लगाई गई पाबंदियों को ‘अवैध दबाव’ करार दिया। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रूस के अलावा कोई अन्य ठोस विकल्प नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि वैश्विक बाजार के अन्य स्रोत युद्ध के कारण बाधित हैं।

सऊदी अरब में चीन की सेंध, भारत के लिए बढ़ी मुश्किल

सिर्फ रूसी तेल ही नहीं, बल्कि भारत के पारंपरिक सहयोगी सऊदी अरब में भी चीन ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। सऊदी अरब ने चीन की रिफाइनरियों में बड़ा निवेश किया है, जिसका फायदा उसे अब मिल रहा है। अप्रैल में सऊदी ने चीन को 13.5 लाख बैरल तेल भेजा, जिससे यह साफ है कि चीन हर मोर्चे पर भारत को कड़ी टक्कर दे रहा है। ऐसे में भारत के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बचाए रखने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

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