किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग से एक बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक मामला सामने आया है। यहां गरीब कैंसर मरीजों को मुफ्त इलाज देने के लिए चलाई जा रही ‘असाध्य योजना’ में करोड़ों रुपये के बड़े घोटाले की आशंका जताई जा रही है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि जो जीवनरक्षक और महंगे इंजेक्शन मरीजों को छह महीने में सिर्फ एक बार लगाए जाने चाहिए थे, उन्हें कागजों पर एक ही महीने में कई-कई बार लगा हुआ दिखा दिया गया। इस खेल के जरिए सरकारी धन का बंदरबांट कर लाखों-करोड़ों रुपये के फर्जी भुगतान की तैयारी थी। मामला उजागर होते ही केजीएमयू प्रशासन में हड़कंप मच गया है। कुलपति के निर्देश पर तत्काल प्रभाव से सभी संबंधित दवाओं और इंजेक्शनों के बिलों के भुगतान पर रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही पूरे मामले की परतें खोलने के लिए पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन कर दिया गया है। यह कमेटी अब मरीजों के बेड हेड टिकट, दवा वितरण रजिस्टर, इंजेक्शन की वास्तविक खपत और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों को खंगालने में जुट गई है।
असाध्य योजना के बजट पर डाका और नियमों की धज्जियां
केजीएमयू का यूरोलॉजी विभाग प्रोस्टेट, किडनी और पेशाब की थैली समेत अन्य अंगों के कैंसर से पीड़ित मरीजों के इलाज का एक प्रमुख केंद्र है। यहां आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब मरीजों को सहारा देने के लिए सरकार की असाध्य योजना संचालित होती है। लेकिन, चंद अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से इस पवित्र योजना को ही कमाई का जरिया बना लिया गया। आरोप है कि विभाग में नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर कैंसर, आयरन और प्रोटीन की बेहद महंगी दवाओं को मरीजों के नाम पर फर्जी तरीके से खपाया गया। इस पूरे खेल में दवा की निर्धारित डोज और दो खुराकों के बीच के जरूरी समय के अंतर को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। जब इस घपलेबाजी की शुरुआत हुई, तो अचानक से इन दवाओं की मांग में अप्रत्याशित रूप से तेजी आने लगी, जिसने प्रशासन के कान खड़े कर दिए।
महज पांच महीनों में चार गुना बढ़ गई दवाओं की खपत
इस पूरे घोटाले की टाइमलाइन को देखें तो समझ आता है कि कैसे सरकारी पैसे को बेरहमी से ठिकाने लगाया जा रहा था। अक्टूबर-नवंबर 2025 तक यूरोलॉजी विभाग में जहां हर महीने लगभग 10 लाख रुपये की दवाओं की खपत दर्ज की जा रही थी, वहीं फरवरी 2026 आते-आते यह आंकड़ा अचानक बढ़कर करीब 40 लाख रुपये प्रति माह पहुंच गया। हद तो तब हो गई जब मार्च 2026 में यह बजट 45 लाख रुपये के पार निकल गया। इतनी तेजी से बढ़ते बजट और दवाओं की भारी मांग को देखकर केजीएमयू के वरिष्ठ अधिकारियों को गहरा शक हुआ। इसके बाद जब बिलों और डॉक्टरों के ओरिजिनल प्रिसक्रिप्शन (पर्चे) का इंटरनल ऑडिट शुरू कराया गया, तो एक के बाद एक कई गंभीर गड़बड़ियां और खामियां पकड़ में आती चली गईं।
3 करोड़ के फेरबदल में 10 हजार वाले इंजेक्शन का खेल
जांच में जो बातें सामने आ रही हैं, वे बेहद हैरान करने वाली हैं। कागजों पर कुछ मरीजों को एक ही महीने के भीतर चार से पांच बार आयरन और प्रोटीन के महंगे इंजेक्शन लगाना दर्शा दिया गया। चिकित्सा विज्ञान के नियमों के अनुसार, इनमें से कई इंजेक्शन ऐसे हैं जिन्हें छह महीने में सिर्फ एक बार ही मरीज को दिया जा सकता है। बाजार में इनमें से प्रत्येक इंजेक्शन की कीमत आठ से दस हजार रुपये के बीच है। इसके अलावा, नियमानुसार कैंसर मरीजों को अस्पताल में भर्ती करके ही ये दवाएं और इंजेक्शन देने का प्रावधान है, लेकिन इस महत्वपूर्ण नियम का भी डॉक्टरों और स्टाफ ने जमकर उल्लंघन किया। शुरुआती आकलन के आधार पर अधिकारियों ने आशंका जताई है कि यह पूरा दवा घोटाला करीब 3 करोड़ रुपये के आस-पास का हो सकता है।
संविदा कर्मचारी के हाथ में सौंपी करोड़ों की चाबी
इस बड़े गड़बड़झाले के पीछे यूरोलॉजी विभाग के भीतर की एक बड़ी प्रशासनिक लापरवाही भी सामने आई है। अस्पताल के नियमों को दरकिनार करते हुए विभाग के कुछ रसूखदार अफसरों ने अपने एक चहेते संविदा कर्मचारी (कॉन्टैक्ट वर्कर) को असाध्य योजना की इन करोड़ों रुपये की दवाओं की पूरी जिम्मेदारी सौंप रखी थी। दवाओं का ऑर्डर देने से लेकर स्टोर से उन्हें रिसीव करने तक का सारा काम अकेले वही संविदा कर्मी देख रहा था। जबकि केजीएमयू प्रशासन के सख्त आदेश हैं कि दवाओं का ऑर्डर देने के लिए सिर्फ अधिकृत और परमानेंट नर्सिंग ऑफिसर ही जिम्मेदार होंगे, और दवाओं को रिसीव करने का काम किसी दूसरे नर्सिंग ऑफिसर का होगा ताकि पारदर्शिता बनी रहे। केजीएमयू के लगभग सभी विभागों में इसी पारदर्शी व्यवस्था का पालन होता है, लेकिन यूरोलॉजी विभाग में इस नियम को जानबूझकर बदला गया, जिसका नतीजा आज इस बड़े घोटाले के रूप में सामने है। फिलहाल कुलपति ने साफ किया है कि जांच कमेटी की रिपोर्ट आते ही दोषियों के खिलाफ बेहद सख्त कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
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