Thursday , 3 September 2026

नेपाल में जलप्रलय से हाहाकार: रसुवा में हजारों जिंदगियां लील गई भोटेकोशी नदी, अब संयुक्त राष्ट्र से मुआवजे की उठी मांग; निशाने पर ड्रैगन की भूमिका

नेपाल के रसुवा जिले में कुदरत का ऐसा कहर टूटा है जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। भोटेकोशी नदी में उठे भयावह सैलाब ने पलक झपकते ही हजारों लोगों को अपनी आगोश में ले लिया। अनगिनत जिंदगियां खत्म हो चुकी हैं और अब भी सैकड़ों लोग लापता हैं। चारों तरफ मलबे का ढेर, टूटी सड़कें और तबाही का खौफनाक मंजर पसरा है। इस बीच, जमीनी स्तर पर जारी राहत और बचाव कार्यों के समानांतर अब अंतरराष्ट्रीय पटल पर इसके वित्तीय हरजाने को लेकर नई बहस छिड़ गई है। नेपाल सरकार ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यह महज एक मौसमी हादसा नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन से उपजी वैश्विक त्रासदी है, जिसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुआवजा मिलना चाहिए।

प्रलयंकारी बाढ़ को बताया क्लाइमेट चेंज का नतीजा

नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन व्यवस्था के तहत बने लॉस एंड डैमेज फंड (Loss and Damage Fund) से तत्काल आर्थिक पैकेज देने की आधिकारिक अपील की है। नेपाल के जलवायु परिवर्तन प्रबंधन प्रभाग के प्रमुख डॉ. महेश्वर ढकाल ने सख्त रुख अपनाते हुए आंकड़े सामने रखे। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन पैदा करने में नेपाल की भागीदारी न के बराबर है, लेकिन इसका सबसे क्रूर असर सीधे तौर पर उनके देश को भुगतना पड़ रहा है। विश्व बैंक के 2024 के रिकॉर्ड बताते हैं कि नेपाल का सालाना प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन महज 0.54 टन है, जबकि पूरी दुनिया का औसत 4.67 टन दर्ज है। तुलना के तौर पर अमेरिका 13.6 टन और चीन 9.3 टन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन करता है।

26 अगस्त की सुबह कैसे मची थी भयंकर तबाही

26 अगस्त 2026 को रसुवा जिले के ऊपरी हिमालयी इलाके में अचानक चट्टानों और ग्लेशियर का एक बहुत बड़ा हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा। इस विशालकाय भूस्खलन के कारण भोटेकोशी नदी में एक झटके में बेहिसाब मलबा, बोल्डर और पानी का तूफानी रेला बह निकला। तेज धार ने किनारे बसे दर्जनों गांवों, प्रमुख राजमार्गों, पुलों और चालू जलविद्युत परियोजनाओं (Hydropower Projects) का नामोनिशान मिटा दिया। बुनियादी ढांचा पूरी तरह ध्वस्त होने के चलते नेपाल ने इसे जलवायु जनित संकट मानते हुए अंतरराष्ट्रीय फंड का दरवाजा खटखटाया है।

क्या है यूएन का लॉस एंड डैमेज फंड?

पर्यावरण संकट के संदर्भ में ‘एडाप्शन’ और ‘लॉस एंड डैमेज’ दो बड़े पहलू हैं। एडाप्शन का अर्थ आपदा से बचने की पूर्व तैयारी होता है, जबकि लॉस एंड डैमेज वह भयावह नुकसान है जिसे तमाम सावधानियों के बाद भी टाला नहीं जा सकता। इसी तरह के नुकसान से निपटने के लिए मिस्र में हुए COP27 सम्मेलन के दौरान 2022 में लॉस एंड डैमेज फंड को मंजूरी दी गई थी। इसका मकसद कमजोर और विकासशील देशों को अप्रत्याशित पर्यावरणीय आपदाओं से उबरने के लिए वित्तीय ताकत देना है।

क्या सीधे चीन से हर्जाना मांग रहा है काठमांडू?

विकासशील देशों के समूह G-77 और चीन (जिसमें 134 से अधिक मुल्क शामिल हैं) ने लंबे वक्त से इस अलग फंड की पैरवी की थी। नेपाल की इस मांग को सीधे तौर पर किसी एक देश से वसूला जाने वाला जुर्माना नहीं माना जा सकता। यह एक अंतरराष्ट्रीय तंत्र है जिसके जरिए प्रभावित मुल्कों को मदद दी जाती है। नेपाल की मंशा किसी द्विपक्षीय मुआवजे के बजाय यूएन की स्थापित व्यवस्था से अपना कानूनी हक पाने की है।

खर्च 50 अरब और मिलने की उम्मीद सिर्फ 3 अरब

नेपाल ने अभी किसी निश्चित पैकेज की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन यूएन फंड की प्रक्रियाओं के अनुसार प्रभावित देश 5 से 20 मिलियन डॉलर (लगभग 3 अरब नेपाली रुपये) तक के प्रस्ताव भेज सकते हैं। यदि नेपाल को अधिकतम 20 मिलियन डॉलर मिल भी जाते हैं, तो यह ऊंट के मुंह में जीरा साबित होगा। नेपाल के सड़क विभाग के शुरुआती अनुमान बताते हैं कि सिर्फ तबाह हुए पुलों और सड़कों को दोबारा बनाने में 50 अरब नेपाली रुपये से अधिक का खर्च आएगा।

ड्रैगन की लापरवाही और संदिग्ध भूमिका पर सवाल

इस पूरे संकट में चीन के रवैये को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसी आपदाओं के समय कुछ मिनटों की पूर्व चेतावनी भी सैकड़ों जानें बचा सकती थी, लेकिन नेपाल को समय रहते चीन की ओर से कोई पुख्ता अलर्ट नहीं मिला। शुरुआत में चीन ने इसे केवल एक भूकंपीय घटना बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की, जिसे बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने खारिज करते हुए भारी ग्लेशियर ढहने की पुष्टि की। इसके अलावा, हिमालय के इस बेहद संवेदनशील इलाके में चीन द्वारा तेजी से बनाए जा रहे कंक्रीट के पुल, हाईवे, बांध और नई बस्तियां पूरे इकोसिस्टम को कमजोर कर रही हैं। चीनी वैज्ञानिकों ने खुद पहले अस्थिर ढलानों और चेन-रिएक्शन लैंडस्लाइड की चेतावनी दी थी, जिसे नजरअंदाज किया गया। यही नहीं, तिब्बत में बड़े पैमाने पर लापता लोगों की खबरों के बीच चीनी तंत्र पर मौतों और तबाही का सही पैमाना छिपाने के आरोप भी लग रहे हैं।

खाली खजाना: लॉस एंड डैमेज फंड की जमीनी हकीकत

कागजों पर 134 देशों के लिए करीब 82 करोड़ डॉलर जुटाने का भरोसा दिया गया था, मगर हकीकत यह है कि अब तक फंड के खाते में महज 40 करोड़ डॉलर ही आ पाए हैं। दूसरी ओर, दुनिया भर में जलवायु जनित आपदाओं से तबाह हो रहे देशों की आर्थिक मांगें खरबों में पहुंच चुकी हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि भोटेकोशी का यह सैलाब सीधे तौर पर क्लाइमेट चेंज का परिणाम था और क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय नेपाल को इस तबाही से उबारने के लिए पर्याप्त मदद दे पाएगा।

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