
रसोई के बजट पर एक बार फिर महंगाई की तीखी मार पड़ी है और प्याज आम जनता की जेब ढीली करने के साथ आंखों में आंसू ला रही है। पिछले एक साल की तुलना करें तो मंडियों से लेकर फुटकर दुकानों तक प्याज की खुदरा कीमतें दोगुनी से भी अधिक हो चुकी हैं। केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि खुदरा के साथ-साथ थोक बाजार में भी कीमतें तेजी से उछली हैं। थोक बाजार में 21 सितंबर को प्याज ₹4,615.98 प्रति क्विंटल के स्तर पर बिका, जो ठीक एक साल पहले ₹3,299.85 प्रति क्विंटल था। यानी इस अवधि में प्याज की थोक कीमतों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
करीब 10 महीने तक स्थिर रहने के बाद पिछले दो महीनों में प्याज के दाम अचानक चढ़ने लगे। राष्ट्रीय औसत की बात करें तो महज एक महीने पहले प्याज की औसत खुदरा कीमत ₹40.79 प्रति किलो थी, जो 21 सितंबर तक बढ़कर ₹54.23 प्रति किलो पर पहुंच गई।
देश के बड़े महानगरों में प्याज के खुदरा भाव का हाल
महानगरों और प्रमुख शहरों में प्याज की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिला है। एक साल पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जो प्याज ₹32 प्रति किलो मिल रहा था, वह अब ₹53 प्रति किलो बिक रहा है। आर्थिक राजधानी मुंबई में इसके दाम ₹30 से उछलकर ₹58 प्रति किलो हो गए हैं। दक्षिण के प्रमुख शहर चेन्नई में प्याज ₹30 से सीधे ₹60 प्रति किलो के स्तर को छू गया है, जबकि रांची में ₹25 प्रति किलो बिकने वाला प्याज अब ₹57 प्रति किलो के भाव पर पहुंच चुका है।
क्यों बढ़ रहे हैं दाम और कब कम होंगी कीमतें?
प्याज के दामों में इस अप्रत्याशित उछाल के पीछे प्रमुख वजह फसल को हुआ नुकसान है। महाराष्ट्र में मार्च महीने के दौरान हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने गर्मियों की प्याज की फसल को बड़ा नुकसान पहुंचाया। इसके अलावा केंद्रीय एजेंसियों के बफर स्टॉक में भी लगभग 30 प्रतिशत प्याज नमी और मौसम की मार से खराब हो गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्याज की मांग अपेक्षाकृत कमजोर रही है और पड़ोसी देश बांग्लादेश में स्थानीय उत्पादन बढ़ने से विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
राहत की बात यह है कि पिछले एक सप्ताह से मंडियों में प्याज के थोक भाव स्थिर बने हुए हैं। मौजूदा समय में उच्च गुणवत्ता वाले प्याज की प्रमुख मांग बीज कंपनियों की तरफ से आ रही है। जानकारों के मुताबिक, बीज कंपनियों की यह थोक खरीद पूरी होते ही खुदरा बाजार में प्याज की कीमतों में ₹5 से ₹10 प्रति किलो तक की गिरावट देखने को मिल सकती है।
साल के इन खास महीनों में क्यों बिगड़ता है प्याज का गणित?
प्याज की कीमतों में हर साल एक खास अवधि में उछाल आने का सीधा संबंध इसके फसल चक्र और मंडियों में होने वाली आवक (सप्लाई) से है। रबी सीजन की प्याज मुख्य रूप से मार्च-अप्रैल के दौरान मंडियों में पहुंचती है। यही वह फसल होती है जिसे लंबे समय तक भंडारित (स्टोर) किया जाता है। इसके बाद खरीफ सीजन की नई फसल आने तक देश भर की रसोई की जरूरतें इसी कोल्ड स्टोरेज और गोदामों में रखे पुराने रबी स्टॉक से पूरी होती हैं।
अगस्त से जनवरी के बीच सप्लाई पर रहता है दबाव
रबी सीजन का स्टॉक महीनों की खपत के साथ धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। यही कारण है कि अगस्त से लेकर जनवरी के बीच कई प्रमुख थोक मंडियों में प्याज की दैनिक आवक काफी घट जाती है। मांग पुरानी बनी रहती है लेकिन मंडियों में उपलब्धता कम होने से मांग और आपूर्ति के बीच खाई चौड़ी हो जाती है, जिसका सीधा असर कीमतों पर दबाव के रूप में दिखाई देता है।
नई खरीफ फसल की आवक से टूटेगी महंगाई
मंडियों में नई खरीफ फसल की आवक तेज होते ही प्याज की उपलब्धता में सुधार होना तय माना जा रहा है। जैसे ही नई खेप बड़े पैमाने पर पहुंचेगी, कीमतों में तेजी का दौर थमेगा और आम उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतें पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेंगी कि खरीफ के अंतिम चरण में मौसम कैसा रहता है, ढुलाई लागत (ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट) क्या रहती है और स्थानीय स्तर पर मांग का रुझान किस तरफ जाता है।
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