
नई दिल्ली। राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि वह इस बहस में नहीं पड़ेगी कि राष्ट्रीय गीत को केवल दो छंदों (स्टैंजा) तक सीमित रखा जाए या इसे सभी छह छंदों तक विस्तारित किया जाए। हालांकि, अदालत ने एक बेहद अहम संवैधानिक पहलू पर विचार करने की सहमति दी है—क्या राष्ट्रीय गीत न गाने को कानूनी तौर पर एक दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है?
बिजो इमैनुएल फैसले की नजीर, शीर्ष अदालत ने केंद्र से मांगा जवाब मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक बिजो इमैनुएल मामले में दिए गए फैसले की याद दिलाई। पीठ ने रेखांकित किया कि उस फैसले के अनुसार राष्ट्रगान न गाने पर किसी व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता और यह कानूनी सिद्धांत आज भी प्रभावी है। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने केंद्र सरकार से इस जनहित याचिका पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने को कहा है। हालांकि, मौजूदा चरण में सरकार को कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया। पीठ ने टिप्पणी की कि इस कानून के तहत दंडात्मक प्रावधानों का परीक्षण संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता व मौलिक अधिकारों के आधार पर किया जा सकता है।
कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा ने क्यों दी कानून को चुनौती? यह जनहित याचिका प्रख्यात कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर की गई है, जिसमें वंदे मातरम् के सभी छह छंदों के गायन को अनिवार्य बनाए जाने के खिलाफ सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की दलील है कि राष्ट्रीय गीत के अंतिम चार छंदों में प्रत्यक्ष रूप से हिंदू देवी-देवताओं की उपासना और भक्ति का भाव निहित है। ऐसे में इन्हें गाना अनिवार्य करना भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और व्यक्तिगत आस्था के खिलाफ है। याचिका में उस कानूनी संशोधन पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई है, जिसके जरिए वंदे मातरम् को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम के दायरे में लाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह कदम मनमाना है, नागरिक स्वतंत्रता पर प्रहार करता है और एक बहुसंख्यक धार्मिक संदेश को थोपने जैसा है।
सॉलिसिटर जनरल का पलटवार: आजादी की लड़ाई में गीत के महत्व को न भूलें केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस जनहित याचिका का जोरदार विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि जो तत्व संविधान और विधि के शासन पर यकीन नहीं रखते तथा जिनकी विचारधारा नक्सलवादी सोच से प्रेरित है, उन्हें देश के स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय गीत के अतुलनीय योगदान और इसकी ऐतिहासिक भूमिका को दरकिनार कर इस पर सवाल खड़े करने का कोई हक नहीं है।
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