Friday , 18 September 2026

यूपी पुलिस की मनमानी जांच पर हाईकोर्ट का बड़ा चाबुक: अब गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग होगी अनिवार्य, डीजीपी को कड़े कदम उठाने के निर्देश

प्रयागराज ब्यूरो। उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की तफ्तीश को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिस जांच को पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के उद्देश्य से गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य करने पर गंभीरता से विचार करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट लहजे में कहा कि इस व्यवस्था से विवेचना की विश्वसनीयता बढ़ेगी और जांच प्रक्रिया में होने वाले फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी। इसके लिए अदालत ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को तुरंत आवश्यक व प्रभावी कदम उठाने को कहा है।

आगरा के दहेज मामले में सुनवाई के दौरान खुली पुलिस की पोल यह सख्त आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने आगरा जिले से जुड़े एक दहेज उत्पीड़न मामले में आरोपी चंद्रकांत की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत में जिरह के दौरान जब विवेचक (जांच अधिकारी) से सवाल-जवाब किए गए, तो उसने स्वीकार किया कि उसने मुख्य शिकायतकर्ता का बयान कलमबंद करते वक्त उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी। अपनी इस गंभीर चूक और लापरवाही पर जांच अधिकारी को अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी।

कानून में पहले से मौजूद है इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग का प्रावधान मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180(3) और बीएनएसएस नियम 2024 के नियम 20(1) में जांच अधिकारी को गवाह का बयान ऑडियो-वीडियो या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया है। पुलिस महकमे के पास यह तकनीकी सुविधा और कानूनी आधार पहले से मौजूद है, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं किया जा रहा है। पीठ ने डीजीपी द्वारा 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 को जारी किए गए उन सर्कुलरों का भी हवाला दिया, जिनमें बयानों की इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए थे।

फर्जी बयानों और मनगढ़ंत चार्जशीट से बचने के लिए रिकॉर्डिंग से कतराते हैं विवेचक हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए चिंता जताई कि अदालत के सामने लगातार ऐसे कई मामले आ रहे हैं जहां डीजीपी के स्पष्ट सर्कुलर के बावजूद विवेचक गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने से बचते हैं। अदालत ने कहा कि कई जांच अधिकारी जानबूझकर इस रिकॉर्डिंग से इसलिए कतराते हैं ताकि वे अपनी सहूलियत के हिसाब से बयान गढ़ सकें। अक्सर पुलिस पर यह गंभीर आरोप लगता है कि गवाह का बयान खुद विवेचक ने अपने दफ्तर में बैठकर लिख दिया या फिर एफआईआर की ही बातों को हूबहू गवाह के बयान के तौर पर दोहरा दिया गया।

‘वैकल्पिक’ व्यवस्था का गलत फायदा उठा रहे अधिकारी अदालत ने डीजीपी के सर्कुलर संख्या 24/2025 का संदर्भ देते हुए कहा कि इसमें दुष्कर्म पीड़िता का बयान दर्ज करते समय ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पूरी तरह अनिवार्य की गई है, जबकि बीएनएसएस की धारा 180 के तहत अन्य गवाहों के बयान की रिकॉर्डिंग को विवेचकों की मर्जी यानी वैकल्पिक (ऑप्शनल) छोड़ दिया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी इस छूट का लगातार दुरुपयोग कर रहे हैं। यही वजह है कि अब सभी आपराधिक मामलों में गवाहों के बयानों की रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाने पर ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है।

असली मुजरिम को सजा मिले, निर्दोष न फंसे: हाईकोर्ट की दो टूक न्यायमूर्ति देशवाल ने डीजीपी को निर्देशित किया कि राज्य के प्रत्येक जांच अधिकारी को इन वैधानिक दिशा-निर्देशों से पूरी तरह अवगत कराया जाए और नियमों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने साफ कहा कि आपराधिक जांच का एकमात्र बुनियादी मकसद असली मुजरिम को कानून के कठघरे में खड़ा करना और न्याय दिलाना है। किसी भी सूरत में लचर, पक्षपातपूर्ण या फर्जी जांच की वजह से निर्दोष व्यक्तियों को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। जांच प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक का समावेश होने से न केवल पारदर्शिता आएगी, बल्कि अदालतों में गवाहों के बयानों पर उठने वाले विवाद भी खत्म होंगे।

 

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