
नई दिल्ली उत्तर भारत के छह राज्यों के बीच दशकों से चला आ रहा पानी का विवाद अब पूरी तरह सुलझने जा रहा है। केंद्र सरकार की मजबूत पहल के बाद आज यानी 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाले इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच जल और बिजली बंटवारे पर अंतिम मुहर लगेगी। इससे पहले 15 जून को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में हुई अहम बैठक में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जल वितरण के फॉर्मूले पर अपनी सहमति जता दी थी।
पानी और बिजली का अनूठा संतुलन: जानिए किसे क्या मिला किशाऊ परियोजना से जुड़े जल और ऊर्जा बंटवारे का ढांचा बेहद संतुलित तरीके से तैयार किया गया है। समझौते के तहत सबसे बड़ा फैसला यह हुआ है कि हिमाचल प्रदेश के हिस्से का अतिरिक्त पानी दिल्ली और राजस्थान को दिया जाएगा। इसके बदले दिल्ली और राजस्थान दोनों राज्य हिमाचल के हिस्से की बिजली लागत का भार उठाएंगे। दूसरी ओर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को जल घटक के लिए कोई आर्थिक अंशदान नहीं देना होगा। जल आपूर्ति से जुड़े खर्च का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार अपनी वित्तीय सहायता से वहन करेगी। इस तरह लागत और संसाधनों का ऐसा तालमेल बनाया गया है जिससे किसी भी राज्य के हितों को नुकसान न पहुंचे।
किस राज्य के खाते में जाएगा कितना पानी परियोजना के तहत पानी की हिस्सेदारी को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ कर दी गई है। जारी प्रस्ताव के अनुसार हरियाणा को सबसे ज्यादा 836 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और देश की राजधानी दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलेगा। यह परियोजना केवल किसी एक राज्य की प्यास बुझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत में पीने के पानी और सिंचाई की किल्लत को हमेशा के लिए खत्म करने में मील का पत्थर साबित होगी।
एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध: जानिए क्या है किशाऊ परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर इस राष्ट्रीय परियोजना का निर्माण किया जाना है। टोंस नदी वास्तव में यमुना की मुख्य सहायक नदी है। परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचा विशाल कंक्रीट गुरुत्व बांध बनेगा, जो आकार में टिहरी बांध के बाद पूरे एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध कहलाएगा। लगभग 15,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में 660 मेगावाट हरित ऊर्जा उत्पादन की स्थापित क्षमता होगी, जिससे हर साल लगभग 1,379 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होगी और इसे उत्तराखंड व हिमाचल के बीच बराबर बांटा जाएगा।
यमुना की सफाई और बाढ़ नियंत्रण में निभाएगा जीवनदायिनी भूमिका किशाऊ बांध केवल सिंचाई और बिजली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह दिल्ली और उत्तर प्रदेश में यमुना नदी के कायाकल्प में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। मानसून के चरम दिनों में यह भारी जलप्रवाह को रोककर बाढ़ की तबाही को नियंत्रित करेगा। वहीं भीषण गर्मी और सूखे के दिनों में जब यमुना सूखने लगती है, तब टोंस और यमुना में निरंतर पानी छोड़ा जाएगा। इस निरंतर प्रवाह से यमुना का पारिस्थितिकी तंत्र सुधरेगा और नदी स्वच्छता अभियान को जमीन पर नई ताकत मिलेगी।
छह दशक तक क्यों फाइलों में अटका रहा किशाऊ किशाऊ परियोजना की रूपरेखा करीब साठ साल पहले खींची गई थी। शुरुआती दशकों में यह परियोजना तकनीकी पहलुओं, भूगर्भीय जांच, डीपीआर और वित्तीय बंटवारे जैसे उलझनों में फंसी रही। वर्ष 2008 में केंद्र ने इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया, जिसके बाद उत्तराखंड और हिमाचल ने मिलकर संयुक्त उपक्रम भी बनाया। बावजूद इसके, सभी छह राज्यों की एक राय न बन पाने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका। अब केंद्र की मध्यस्थता से दशकों पुराना यह गतिरोध हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।
नई डीपीआर से बढ़ा जल भंडारण: 23 हजार करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी परियोजना की संशोधित डीपीआर ने किशाऊ की जल संचयन क्षमता को नई ऊंचाई दी है। बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर तय करते हुए जलाशय की वास्तविक भंडारण क्षमता को 1324 एमसीएम से बढ़ाकर 1561.91 मिलियन घन मीटर (MCM) कर दिया गया है। यानी अब इसमें 237.81 एमसीएम अतिरिक्त पानी जमा होगा। आसान शब्दों में समझें तो यह लगभग 23,781 करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी है, जो बारिश के पानी को सहेजकर सूखे मौसम में राज्यों की जरूरत पूरी करेगा।
किशाऊ परियोजना के मुख्य आंकड़े
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बांध की कुल ऊंचाई: 232.6 मीटर
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जलाशय की भंडारण क्षमता: 1561.91 एमसीएम
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अतिरिक्त जल भंडारण: 237.81 एमसीएम (लगभग 23,781 करोड़ लीटर)
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स्थापित बिजली क्षमता: 422 मेगावाट (हरित ऊर्जा क्षमता 660 मेगावाट)
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औसत वार्षिक बिजली उत्पादन: 1457 मिलियन यूनिट (पुराने अनुमान से 78 मिलियन यूनिट अधिक)
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कुल प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र: लगभग 97,076 हेक्टेयर
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भागीदार राज्य: 6 (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान)
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