
नई दिल्ली। गणेश उत्सव के पावन पर्व पर घर-घर और भव्य पूजा पंडालों में रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश की आराधना पूरे विधि-विधान से की जा रही है। बप्पा की पूजा में लाल पुष्प, सिंदूर, मोदक और दूर्वा का विशेष महत्व होता है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि गणपति को भोग लगाते समय 21 मोदक और 21 दूर्वा की गांठें ही क्यों समर्पित की जाती हैं? सनातन धर्म और शास्त्रों में इसके पीछे बेहद रोचक पौराणिक कथाओं के साथ-साथ गंभीर आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य छिपे हैं, जो 21 अंक को संपूर्णता का प्रतीक बनाते हैं।
21 मोदक की पौराणिक कथा: जब बाल गणेश की भूख मिटाने के लिए माता अनुसूया ने खिलाया मोदक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार महर्षि अत्रि की तपस्वी पत्नी देवी अनुसूया ने देवाधिदेव महादेव, माता पार्वती और बाल गणेश को आतिथ्य भोजन के लिए आमंत्रित किया। देवी अनुसूया ने प्रण लिया था कि जब तक बाल गणेश पूरी तरह तृप्त नहीं हो जाते, तब तक किसी अन्य को भोजन नहीं परोसा जाएगा। बाल गणेश प्रेमपूर्वक भोजन करने लगे, परंतु उनका पेट ही नहीं भर रहा था। रसोई का लगभग सारा अन्न समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया, लेकिन गजानन की भूख शांत नहीं हुई।
तब देवी अनुसूया ने युक्ति लगाकर बाल गणेश के समक्ष विशेष रूप से तैयार किया गया एक ‘मोदक’ परोसा। मोदक का पहला निवाला मुख में जाते ही बाल गणेश का मन और पेट पूरी तरह तृप्त हो गया। उन्होंने आनंद से भरकर एक जोरदार डकार ली। मान्यता है कि उनके तृप्त होते ही दूसरी ओर बैठे भगवान शिव को भी लगातार 21 बार डकारें आईं। माता पार्वती ने जब मोदक की इस दिव्य शक्ति और गणेश जी की असीम तृप्ति को देखा, तो उन्होंने वरदान स्वरूप घोषणा की कि जो भी भक्त विघ्नहर्ता को 21 मोदक का भोग लगाएगा, उस पर गणपति की अनवरत कृपा बरसेगी। तभी से बप्पा को 21 मोदक अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है।
21 दूर्वा का रहस्य: अनलासुर के संहार के बाद जब शांत हुई बप्पा के उदर की जलन
भगवान गणेश को 21 दूर्वा (दूब घास) चढ़ाने के पीछे दैत्य अनलासुर के वध की कथा प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार, अनलासुर नाम के महादैत्य ने अपनी प्रचंड अग्नि से तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसके अत्याचार से त्रस्त होकर जब देवता और ऋषि-मुनि श्री गणेश की शरण में पहुंचे, तो भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए उस दैत्य को सीधे निगल लिया।
दैत्य को निगलते ही गणेश जी के उदर (पेट) में भयंकर ताप और असहनीय जलन उत्पन्न हो गई। शिव जी सहित समस्त देवताओं के शीतल उपचार भी इस दाह को शांत न कर सके। तब कश्यप ऋषि और अन्य मुनियों ने मिलकर दूर्वा की 21 गांठें बनाईं और मंत्रोच्चार के साथ गणेश जी के मस्तक और उदर पर अर्पित कीं। दूर्वा के स्पर्श और सेवन से बप्पा के शरीर की जलन तत्काल शांत हो गई और उन्हें शीतलता मिली। गजानन ने प्रसन्न होकर कहा कि जो भी भक्त उन्हें दूर्वा अर्पित करेगा, वह उनके परम प्रिय भक्तों में गिना जाएगा।
गणेश पूजा में 21 अंक ही क्यों है विशेष? जानिए दार्शनिक आधार
हिंदू दर्शन में 21 की संख्या को मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व और ब्रह्मांडीय तत्वों का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों में इसके दो प्रमुख दार्शनिक आधार बताए गए हैं:
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तत्वों का समीकरण: 5 ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा), 5 कर्मेंद्रियां (हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ, पायु), 5 महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), 5 तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और 1 मन—इन 21 तत्वों से मिलकर मानवीय देह और चेतना बनती है।
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प्राण और चेतना का स्वरूप: दूसरी व्याख्या के अनुसार 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां, 5 मुख्य प्राण, 5 उपप्राण और 1 मन मिलकर 21 का योग बनाते हैं।
इस प्रकार, भगवान गणेश को 21 की संख्या में मोदक या दूर्वा अर्पित करने का सीधा आध्यात्मिक अर्थ है कि भक्त अपने संपूर्ण अस्तित्व, देह, इंद्रियों और मन को अहंकार रहित होकर भगवान के श्रीचरणों में समर्पित कर रहा है।
21 दूर्वा चढ़ाने के धार्मिक लाभ और उपाय
दूर्वा को अमृत तुल्य, शुद्ध और शीतलता प्रदान करने वाली वनस्पति माना गया है। विघ्नहर्ता को दूर्वा अर्पित करने से कुंडली के बुध दोष शांत होते हैं और जीवन की बाधाएं समाप्त होती हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार:
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बुधवार अथवा गणेश चतुर्थी के पावन दिन 21 दूर्वा की गांठों पर शुद्ध हल्दी का हल्का लेप लगाकर अर्पित करने से बिगड़े काम बनते हैं।
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दूर्वा अर्पित करते समय ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का 21 बार जप करने से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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मोदक ज्ञान और मोक्ष (परमानंद) का प्रतीक है, जबकि दूर्वा जीवन में शीतलता और धैर्य की द्योतक है। इस गणेश उत्सव पर बप्पा को पूर्ण समर्पण भाव से 21 मोदक और 21 दूर्वा अर्पित कर उनके असीम आशीर्वाद के भागीदार बनें।
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