Sunday , 8 November 2026

पार्षद को शपथ न दिलाने पर हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन; लखनऊ मेयर सुषमा खर्कवाल के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार फ्रीज

– नगर निगम के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए लखनऊ के जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को जिम्मेदारी सौंप

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लखनऊ नगर निगम मामले में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने वॉर्ड नंबर-73 (फैजुल्लागंज) से नवनिर्वाचित पार्षद ललित किशोर तिवारी को करीब 5 महीने बीत जाने के बाद भी शपथ न दिलाए जाने पर सख्त नाराजगी जताई है। इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल के सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को तत्काल प्रभाव से रोक (फ्रीज) लगाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने शहर और नगर निगम के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए लखनऊ के जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को जिम्मेदारी सौंप दी है।

यह पूरा विवाद फैजुल्लागंज वॉर्ड-73 के चुनावी नतीजों से जुड़ा हुआ है। दरअसल, सत्र न्यायालय/चुनाव न्यायाधिकरण ने पिछले साल 19 दिसंबर 2025 को इस वॉर्ड के पूर्व पार्षद प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया था। इसके बाद अदालत ने ललित किशोर तिवारी को इस क्षेत्र से नया निर्वाचित पार्षद घोषित किया था। नियमानुसार, निर्वाचन की घोषणा के बाद जल्द ही पार्षद को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जानी चाहिए थी, लेकिन करीब 5 महीने का लंबा समय बीत जाने के बाद भी लखनऊ नगर निगम प्रशासन द्वारा उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई।
शपथ दिलाने में की जा रही इस अत्यधिक देरी के खिलाफ ललित किशोर तिवारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद गंभीरता से लिया। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान जब मेयर सुषमा खर्कवाल और लखनऊ के जिलाधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश होने से छूट की मांग की, तो खंडपीठ का रुख और कड़ा हो गया। कोर्ट ने इस टालमटोल और देरी को सीधे तौर पर कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन और अवमानना माना।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नियमों के तहत किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों और शपथ से वंचित रखना पूरी तरह गैर-कानूनी है। इसी आधार पर कोर्ट ने मेयर के अधिकारों पर रोक लगाने का यह बड़ा कदम उठाया। अदालत के इस फैसले के बाद अब जब तक यह कानूनी गतिरोध पूरी तरह हल नहीं हो जाता, तब तक लखनऊ नगर निगम के सभी बड़े और महत्वपूर्ण वित्तीय व प्रशासनिक फैसले अब पूरी तरह से लखनऊ के डीएम और नगर आयुक्त के संयुक्त नियंत्रण में रहेंगे। नगर निगम के इतिहास में प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार सीज होने का यह अपने आप में बेहद दुर्लभ और गंभीर मामला है।

Check Also

दीपोत्सव 2026: रामपथ पर उतरा आस्था का महाकुंभ, 1 किमी लंबे झांकियों के काफिले को देखने उमड़े लाखों श्रद्धालु; लता मंगेशकर चौक तक ‘जय श्रीराम’ की गूंज

अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन धरा अयोध्या में दीपोत्सव-2026 का उल्लास अपने चरम …