Saturday , 12 September 2026

Global Energy Crisis: दुनिया पर महासंकट, 3 बड़े समुद्री रूट बंद होने की कगार पर; कच्चे तेल में भारी उबाल से भारत में बढ़ेंगी मुश्किलें !

नई दिल्ली दुनिया भर में ऊर्जा संकट अब तक के सबसे खतरनाक मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। सामरिक लिहाज से बेहद संवेदनशील ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पहले से ही गतिरोध का सामना कर रहा था, और अब इराकी क्षेत्र से दागे गए घातक ड्रोनों के निशाने पर आने के बाद सऊदी अरब ने अपनी प्रमुख कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थाई रूप से बंद कर दिया है। आग में घी डालने का काम यमन के लाल सागर तट पर हूती विद्रोहियों के 18 घंटे चले भीषण हमले ने किया है, जिसके बाद हूती लड़ाके ‘बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य’ पर लगभग पूर्ण नियंत्रण हासिल करने की स्थिति में पहुंच चुके हैं।

वैश्विक आपूर्ति की तीन रीढ़ टूटने से 30% तेल सप्लाई पर खतरा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के लिए ये तीनों जलमार्ग प्राणवायु माने जाते हैं। अकेले होर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व का लगभग 20 फीसदी कच्चा तेल गुजरता है, जबकि सऊदी अरब की मुख्य पाइपलाइन प्रतिदिन 40 से 50 लाख बैरल तेल पश्चिम की ओर भेजती है। इसके अतिरिक्त बाब अल-मंडेब समुद्री मार्ग से हर दिन करीब 40 से 50 लाख बैरल (वैश्विक समुद्री तेल और गैस व्यापार का 5 से 12 फीसदी) तेल का परिवहन होता है। इन तीनों अहम रास्तों के एक साथ बाधित होने से दुनिया की लगभग 30 फीसदी ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह ठप होने के कगार पर पहुंच गई है। इस स्थिति ने ईरान को रणनीतिक बढ़त दिला दी है, जिससे वह खाड़ी देशों से निकलने वाले ऊर्जा प्रवाह को अपनी शर्तों पर नियंत्रित कर सकता है।

रास्ते बंद हुए तो दुनिया भर में मचेगा हाहाकार, 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचे दाम यदि यह गतिरोध लंबे समय तक बना रहा, तो यूरोप, भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देशों को अप्रत्याशित ऊर्जा झटके का सामना करना पड़ेगा। तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू चुकी हैं और आपूर्ति रुकने की स्थिति में इनका अनियंत्रित होना तय है। घरेलू मोर्चे पर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के भाव आसमान छूने लगेंगे। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में भारी उछाल आएगा। वहीं उद्योगों को मिलने वाला कच्चा माल महंगा होने से विनिर्माण लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और देश की आर्थिक विकास दर पर पड़ेगा।

शेयर बाजारों में मंदी की आहट, कंपनियों के मुनाफे पर गिरेगी गाज भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल में आग लगने का सीधा असर वैश्विक शेयर बाजारों पर देखने को मिल सकता है। आयात-निर्यात लागत में भारी बढ़ोतरी से कंपनियों के तिमाही मुनाफे पर गहरा दबाव बनेगा। विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकाल सकते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार सहित दुनिया भर के वित्तीय तंत्र में तीव्र गिरावट और मंदी जैसी स्थिति गहरा सकती है।

सऊदी पाइपलाइन और यूरोप का दांव सऊदी अरब का तेल उसके पूर्वी तेल क्षेत्रों से अरब प्रायद्वीप के अंदरूनी रास्तों से होते हुए पश्चिम में लाल सागर स्थित ‘यानबू पोर्ट’ (Yanbu Port) पहुंचता है, जहां से विशालकाय टैंकरों के जरिए इसे यूरोपीय बाजारों में भेजा जाता है। हालांकि यह मार्ग दुनिया के कुल तेल का लगभग 4 से 5 फीसदी ही संभालता है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद अहम है। इसके बंद होने से सबसे बड़ा झटका यूरोपीय देशों की रिफाइनरियों को लगेगा।

बाब अल-मंडेब पर हूतियों की घेराबंदी और भारत की दोहरी चिंता यमन के लाल सागर तट पर स्थित 29 किलोमीटर चौड़ा बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इस चौक-पॉइंट पर हूती विद्रोहियों का कब्जा भारत के लिए दोहरे संकट जैसा है। भारत न केवल खाड़ी देशों से पेट्रोकेमिकल और कच्चे तेल के आयात के लिए इस रूट पर निर्भर है, बल्कि नीदरलैंड के रॉटरडैम और फ्रांस के मार्सिले जैसे प्रमुख यूरोपीय बंदरगाहों तक भारतीय निर्यात (दवाएं, इंजीनियरिंग गुड्स और मशीनरी) इसी समुद्री गलियारे से होकर पहुंचता है। भारत से होकर गुजरने वाले पेट्रोलियम उत्पादों का प्रवाह जो 2023 में 93 लाख बैरल प्रतिदिन था, वह पहले ही घटकर 2025 की पहली छमाही तक लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर आ चुका था। यदि बाब अल-मंडेब का रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध होता है, तो भारत का समुद्री व्यापार और ईंधन सुरक्षा दोनों गंभीर रूप से चरमरा जाएंगे।

 

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