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देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की फिर बढ़ी चर्चा: पेपर लीक से लेकर जघन्य अपराधों तक त्वरित न्याय की तैयारी, जानें इसकी पूरी ए-टू-जेड प्रक्रिया

नई दिल्ली। देश में जब भी कोई जघन्य अपराध या संवेदनशील मामला सामने आता है, तो पीड़ित पक्ष और समाज की ओर से सबसे पहली मांग ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ में त्वरित सुनवाई की होती है। एक बार फिर यह विशेष अदालतें देश भर में सुर्खियों में हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों को लेकर एक अहम ऐलान किया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल ‘X’ पर जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और ऐसे मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा।

क्या है फास्ट ट्रैक कोर्ट और कब हुई थी इसकी शुरुआत?

फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) यानी ऐसी अदालतें जिन्हें किसी विशिष्ट मामले की कम से कम समय में सुनवाई पूरी कर तुरंत फैसला सुनाने के लिए गठित किया जाता है। देश में पहली बार इन अदालतों की स्थापना साल 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य निचली और जिला अदालतों में सालों से लंबित पड़े मामलों का जल्द से जल्द निपटारा करना था। हालांकि, 2011 में इस योजना को बंद कर दिया गया था, लेकिन 2012 के ऐतिहासिक निर्भया कांड के बाद देश में त्वरित न्याय की आवश्यकता महसूस हुई और दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार व यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए पुनः फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की मंजूरी दी।

केंद्र सरकार का मास्टर प्लान: ₹1,952 करोड़ का बजट और FTSC योजना

वर्ष 2018 में निर्भया फंड समिति की सिफारिशों पर केंद्र सरकार ने क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत ‘फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट’ (FTSC) योजना को लागू किया। इस योजना के लिए कुल ₹1,952.23 करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया, जिसमें केंद्र सरकार निर्भया फंड से ₹1,207.24 करोड़ का योगदान दे रही है और शेष राशि राज्य सरकारें वहन कर रही हैं। अब तक राज्यों को ₹1,034.55 करोड़ जारी भी किए जा चुके हैं।

देश में इस वक्त कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं काम कर रहे?

संसद के मॉनसून सत्र में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 725 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। इनमें 392 ‘एक्सक्लूसिव पॉक्सो (POCSO) कोर्ट’ शामिल हैं, जो केवल बच्चों के साथ हुए यौन अपराधों की सुनवाई के लिए समर्पित हैं। आंकड़ों के मुताबिक:

  • सबसे ज्यादा अदालतें: उत्तर प्रदेश 218 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के साथ देश में शीर्ष पर है, जिसके बाद मध्य प्रदेश (67) और केरल (55) का स्थान आता है।

  • निपटारे की रफ्तार: सामान्य अदालतों में जहां रेप और पॉक्सो मामलों का निपटारा औसतन 3.26 केस प्रति माह है, वहीं फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स में यह दर 9.51 केस प्रति माह है—यानी सामान्य से तीन गुना तेज रफ्तार!

दो श्रेणियों में बंटी हैं ये अदालतें, जानें किन मामलों की होती है सुनवाई

फास्ट ट्रैक कोर्ट मुख्य रूप से दो श्रेणियों में कार्य करती हैं:

  1. सामान्य फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट: ये अदालतें बलात्कार, हत्या, महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराध, वरिष्ठ नागरिकों के मामलों और सालों से लंबित गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई करती हैं। इनका लक्ष्य 6 महीने से 1 साल में फैसला सुनाना होता है।

  2. एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट: ये विशेष अदालतें केवल पॉक्सो (POCSO) एक्ट के मामलों के लिए होती हैं, जहां पीड़ित बच्चों को कोर्ट आने में छूट और विशेष सुरक्षात्मक प्रक्रियाएं दी जाती हैं।

जब इन अदालतों ने महज कुछ दिनों में सुना दिया फांसी और आजीवन कारावास का फैसला

फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ने कई मामलों में मिसाल कायम करते हुए रिकॉर्ड समय में न्याय दिया है:

  • गोरखपुर (अप्रैल 2026): 6 महीने की मासूम से दुष्कर्म के दोषी को मात्र 24 दिनों के भीतर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

  • महाराष्ट्र (जून 2026): नरसापुर में तीन साल की बच्ची से दरिंदगी के आरोपी को महज 55 दिनों में उम्रकैद मिली।

  • मध्य प्रदेश (2023): नाबालिग से रेप के आरोपी को महज 21 दिनों में फांसी की सजा सुनाई गई।

क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को ऊपर की अदालतों में दी जा सकती है चुनौती?

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या इन अदालतों का फैसला अंतिम होता है? जवाब है ‘नहीं’। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स में देश के सामान्य आपराधिक कानून और BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के नियम ही लागू होते हैं। जिला स्तर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के खिलाफ संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में अपील दाखिल की जा सकती है। इसी तरह, हाईकोर्ट स्तर की विशेष पीठ के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का पूरा अधिकार पक्षकारों के पास सुरक्षित रहता है।

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