
नई दिल्ली/वॉशिंगटन दुनियाभर में खौफ का पर्याय बन चुके गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और उसके सहयोगियों पर अब अमेरिका की फेडरल जांच एजेंसी FBI ने अपना शिकंजा कस लिया है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट में 37 आरोपियों के खिलाफ दाखिल की गई चार्जशीट ने इस गैंग के वैश्विक नेटवर्क की पोल खोल दी है। ‘ऑपरेशन हार्डबॉल’ के तहत हुई कार्रवाई में यह स्पष्ट हो गया है कि लॉरेंस और जग्गू भगवानपुरिया जैसे अपराधी केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका सिंडिकेट अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ है।
कैसे काम करता है लॉरेंस का ‘कॉरपोरेट माफिया’ मॉडल
FBI की रिपोर्ट के अनुसार, लॉरेंस बिश्नोई गैंग अब पारंपरिक गिरोहों से बदलकर एक ‘कॉरपोरेट माफिया’ की तरह काम कर रहा है। जेल में बंद होने के बावजूद, लॉरेंस इंटरनेट प्रोटोकॉल (VoIP) और गुप्त मोबाइल फोनों के जरिए अपने साम्राज्य का संचालन कर रहा है। इसके काम करने के मुख्य आधार इस प्रकार हैं:
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कॉन्ट्रैक्ट किलिंग: राजनीतिक हस्तियों और विरोधियों को निशाना बनाना।
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ड्रग्स का वैश्विक जाल: अमेरिका से कनाडा तक कोकीन और मेथामफेटामाइन की तस्करी के लिए इन्होंने एक मजबूत सप्लाई चेन बनाई है।
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डिजिटल रंगदारी: एन्क्रिप्टेड ऐप्स का उपयोग करके विदेशी व्यापारियों को धमकाना और करोड़ों की वसूली करना।
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हथियारों की तस्करी: सीमा पार से ड्रोन्स के माध्यम से हथियारों की अवैध खेप भारत तक पहुंचाना।
प्रमुख ऑपरेटर्स और विदेशी नेटवर्क
इस नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के लिए लॉरेंस ने दुनिया को विभिन्न हिस्सों में बांट रखा है:
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गोल्डी बराड़ (नॉर्थ अमेरिका): इसे अमेरिका और कनाडा में गैंग का सरगना माना जाता है। FBI ने इस पर 50,000 डॉलर का इनाम घोषित किया है।
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रोहित गोदारा (यूरोप): यह यूरोप में नेटवर्क संभालते हुए रंगदारी और हथियारों की तस्करी का मुख्य सूत्रधार है।
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रविंदर सिंह ढांडा (ड्रग्स मास्टरमाइंड): वैंकूवर से संचालित यह व्यक्ति अमेरिका से कनाडा तक ड्रग्स तस्करी के बड़े सिंडिकेट का नेतृत्व कर रहा है।
क्या भारत से अमेरिका प्रत्यर्पित होंगे लॉरेंस और जग्गू?
अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा दाखिल चार्जशीट में लॉरेंस बिश्नोई और जग्गू भगवानपुरिया को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया है। कानून के जानकारों का मानना है कि चूंकि अमेरिका की फेडरल कोर्ट में इन पर गंभीर आरोप (हत्या, अंतरराष्ट्रीय रंगदारी, ड्रग्स तस्करी) तय हो चुके हैं, इसलिए अमेरिका इनके प्रत्यर्पण की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
हालांकि, वर्तमान में दोनों भारत की हाई-सिक्योरिटी जेलों में बंद हैं और NIA समेत विभिन्न जांच एजेंसियों के कई मामलों का सामना कर रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि मौजूद है, लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल है। सबसे पहले भारत में उन पर चल रहे मुकदमों का निपटारा अनिवार्य होगा। इसके बाद ही भारत सरकार अपने राष्ट्रीय कानूनों और द्विपक्षीय संधियों के आधार पर यह निर्णय लेगी कि क्या उन्हें अमेरिका की अदालत में मुकदमे का सामना करने के लिए सौंपा जा सकता है या नहीं।
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