Wednesday , 24 June 2026

अलीगंज अग्निकांड : बार-बार ट्रिप हो रही थी MCB, चेतावनी को किया गया नजरअंदाज….सिस्टम पर उठे 5 तीखे सवाल

लखनऊ। अलीगंज के पुरनिया में हुए भीषण अग्निकांड ने जहां एक ओर पूरी राजधानी को झकझोर कर रख दिया है, वहीं दूसरी ओर इसने सरकारी सिस्टम और बिजली विभाग की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इस मामले में जानकीपुरम जोन के अधिशाषी अभियंता (EXEN) के निलंबन द्वारा कार्रवाई की पहली झलक देखने को मिली है, लेकिन इस कार्रवाई को लेकर बिजली विभाग के भीतर ही बड़ा आक्रोश पनपने लगा है।

इस हादसे को लखनऊ के इतिहास में अब तक का सबसे भीषण अग्निकांड माना जा रहा है। घटना के अगले दिन दोपहर तक भी प्रभावित इलाके में ऐसा सन्नाटा पसरा रहा, जो इस त्रासदी की भयावहता को साफ बयां कर रहा था।

शुरुआती जांच में आग लगने की मुख्य वजह शॉर्ट-सर्किट बताई जा रही है। सूत्रों से मिली बेहद चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, जिस बिल्डिंग में यह हादसा हुआ, वहां की एमसीबी (MCB) बार-बार गिर (ट्रिप) रही थी। इसकी शिकायत भी की गई थी, लेकिन जिम्मेदार लोगों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। बिजली विभाग के ही एक उच्चाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि परिसर में बार-बार एमसीबी ट्रिप हो रही थी, तो यह साफ संकेत था कि या तो ओवरलोडिंग की बड़ी समस्या थी अथवा अंदरूनी तौर पर शॉर्ट-सर्किट की शुरुआत हो चुकी थी। इस बड़ी लापरवाही पर जब जानकीपुरम जोन के चीफ इंजीनियर से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो घटना के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी वे कैमरे पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुए।

विद्युत सुरक्षा निदेशालय की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

बिजली विभाग के बड़े अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के हादसों के लिए केवल बिजली घर के जमीनी कर्मचारियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि असली जवाबदेही विद्युत सुरक्षा निदेशालय की है। जानकीपुरम जोन के एक बिजली इंजीनियर के अनुसार, भारतीय विद्युत नियमावली के मुताबिक किसी भी इमारत को एनओसी (NOC) जारी करने से पहले विद्युत सुरक्षा अधिकारी की रिपोर्ट सबसे अहम होती है। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में कितने विद्युत सुरक्षा अधिकारी वास्तव में तैनात हैं और वे अपनी जिम्मेदारी कितनी मुस्तैदी से निभा रहे हैं?

सुलगते हुए सिस्टम से 5 बड़े सवाल

इस दर्दनाक अग्निकांड के बाद वर्तमान व्यवस्था के सामने कुछ बेहद तीखे और महत्त्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए हैं:

  1. क्या इस पूरे मामले में बिजली सप्लाई कोड के कड़े नियमों का शत-प्रतिशत पालन किया गया था?

  2. जब परिसर का लोड 20 किलोवाट से अधिक था, तब विभाग की तकनीकी टीम ने इस पर समय रहते ध्यान क्यों नहीं दिया? क्या महज़ जुर्माने के सहारे ही इसे लंबे समय तक खींचते रहना ठीक था?

  3. सबसे बड़ा और कड़वा सवाल कि आखिर हर बार कोई बड़ी दुर्घटना होने और मासूमों की जान जाने के बाद ही सिस्टम की नींद क्यों टूटती है?

  4. लखनऊ में संचालित हो रहे सैकड़ों कोचिंग सेंटरों, होटलों और अस्पतालों की सुरक्षा को लेकर बिजली विभाग इस घटना से सबक लेते हुए अब क्या ठोस कदम उठा रहा है?

  5. लोड सैंक्शन कब और किस आधार पर किया जाता है? क्या राजधानी में लोड सैंक्शन की जमीनी हकीकत जानने के लिए कोई बड़ा चेकिंग अभियान चलाया जाएगा?

मीटर रूम की स्थिति भी जांच के दायरे में, संगठन ने उठाई आवाज

इस बीच, उत्तर प्रदेश राज्य संविदा/निविदा कर्मी संगठन के पदाधिकारियों ने भी इस तकनीकी चूक पर अपनी आवाज उठाई है। संगठन का कहना है कि जांच में सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि परिसर का मीटर अंदर लगा था या बाहर, और मीटर रूम की वास्तविक स्थिति क्या थी? क्योंकि कई बार मीटर में लगने वाली आग भी वेंटिलेशन न होने के कारण बेहद खतरनाक रूप ले लेती है। पावर कॉरपोरेशन के एक पूर्व जीएम एस दुबे ने बताया कि नया कनेक्शन जारी करने से पहले उपभोक्ता से भवन स्वामी संबंधी अभिलेख, बी एंड एल फॉर्म व अन्य जरूरी औपचारिकताएं प्राप्त की जाती हैं। बी एंड एल प्रमाण-पत्र, विद्युत सुरक्षा निदेशालय से मान्यता प्राप्त किसी लाइसेंस धारी विद्युत ठेकेदार द्वारा ही जारी किया जाता है, जो यह प्रमाणित करता है कि भवन के अंदर की वायरिंग सुरक्षा मानकों के अनुसार है।

‘अधिशासी अभियंता का निलंबन अन्यायपूर्ण, उपभोक्ता और निदेशालय जिम्मेदार’

विद्युत अभियंता संघ के महासचिव इंजीनियर जितेन्द्र सिंह गुर्जर ने अलीगंज अग्निकांड प्रकरण में जानकीपुरम जोन के अधिशाषी अभियंता के निलंबन को पूरी तरह अन्यायपूर्ण करार दिया है। उन्होंने कहा कि अधिशासी अभियंता को जबरदस्ती बलि का बकरा बनाया गया है, जबकि असली गलती उपभोक्ता और विद्युत सुरक्षा निदेशालय की है। संघ ने साफ किया कि बिजली विभाग सिर्फ मीटर या इनकमिंग केबल में फाल्ट के लिए जिम्मेदार होता है, जबकि आउटपुट केबल या फिर परिसर के अंदर (इंटरनल वायरिंग) कोई फाल्ट होने पर सीधे तौर पर उपभोक्ता और एनओसी देने वाला विद्युत सुरक्षा निदेशालय जिम्मेदार हैं। बहरहाल, देखना यह होगा कि इस बार भी मामला फाइलों में दफन हो जाता है या फिर मुख्य रूप से जिम्मेदार बड़े चेहरों पर कोई सख्त कार्रवाई होती है।

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