लखनऊ। अलीगंज के ऊषा मेहता मार्ग पर स्थित व्यावसायिक इमारत में सोमवार को जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि खुली लापरवाही से की गई सामूहिक हत्या है। इस भीषण अग्निकांड के बीच से अब एक ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला सच सामने आया है, जिसे सुनकर हर किसी की रूह कांप जाए। चश्मदीदों और शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि इमारत के भीतर मौत से जंग लड़ रहे मासूम छात्र-छात्राओं के पास बचने का एक पूरा मौका था। वे भागकर सुरक्षित स्थान पर पहुंच भी चुके थे, लेकिन एन वक्त पर एक ‘लोहे के ताले’ ने उनकी आखिरी उम्मीद को भी हमेशा के लिए दफन कर दिया।
तीसरी मंजिल तक तो पहुंचे, पर आगे किस्मत ने दे दिया दगा
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, जैसे ही इमारत के निचले हिस्से में आग लगी और दम घोंटू काला धुआं सीढ़ियों के रास्ते ऊपर चढ़ने लगा, कोचिंग और एनिमेशन सेंटर के छात्रों में चीख-पुकार मच गई। अपनी जान बचाने के लिए दर्जनों छात्र बदहवास होकर ऊपर की तरफ भागे। वे हांफते हुए, एक-दूसरे को संभालते हुए किसी तरह तीसरी मंजिल को पार कर छत के मुहाने तक पहुंच गए। उनके लिए वह खुली छत जिंदगी की गारंटी थी, जहां खुली हवा में वे सुरक्षित रह सकते थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने छत का दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई—दरवाजा अंदर से पूरी तरह लॉक था।
सुरक्षित होने का वह अधूरा संघर्ष… और थम गईं सांसें
छात्रों ने उस बंद दरवाजे को पीटा, कुंडी को तोड़ने की नाकाम कोशिश की, लेकिन भारी-भरकम दरवाजा टस से मस नहीं हुआ। नीचे से आग की लपटें और जहरीला धुआं लगातार ऊपर की तरफ बढ़ रहा था। पीछे हटने का रास्ता बंद था और आगे जिंदगी का इकलौता रास्ता ताले में कैद था। सीढ़ियों के उसी आखिरी कोने में सुरक्षित होने का वह संघर्ष हमेशा-हमेशा के लिए अधूरा रह गया। रोते-बिलखते पीड़ित परिजनों का सीधे तौर पर कहना है कि “यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है। हमारे बच्चों को आग ने नहीं, बल्कि उस बंद दरवाजे और इमारत के मालिक की लापरवाही ने मारा है।” अगर वह दरवाजा खुला होता, तो आज 15 हंसते-खेलते परिवारों में यह चीख-पुकार और मातम न पसरा होता।
इमरजेंसी प्रोटोकॉल की उड़ी धज्जियां, जांच के घेरे में ‘सिक्योरिटी ऑडिट’
भवन निर्माण और फायर ब्रिगेड के राष्ट्रीय नियमों (National Building Code) के मुताबिक, किसी भी कमर्शियल या रिहायशी बिल्डिंग में आपातकालीन निकास (Emergency Exit) और छत की तरफ जाने वाले रास्तों पर कभी भी ताला नहीं लगाया जा सकता। इन रास्तों को हर समय खुला रखना कानूनी रूप से अनिवार्य है। अलीगंज की इस इमारत में कोचिंग सेंटर और कई दफ्तर चल रहे थे, जहां रोजाना सैकड़ों युवाओं का आना-जाना था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर छत का रास्ता बंद किसके इशारे पर और क्यों किया गया था? क्या एलडीए और फायर विभाग के नियमित सुरक्षा ऑडिट में कभी इस जानलेवा लापरवाही पर नजर नहीं पड़ी?
यह बंद दरवाजा अब इस पूरे मामले की हाई-लेवल जांच का सबसे बड़ा और मुख्य केंद्र बन चुका है। पुलिस और एसआईटी (SIT) इस बात की गहनता से तफ्तीश कर रही है कि आखिर उस वक्त चाबी किसके पास थी और दरवाजा बंद रखने का जिम्मेदार कौन है। साफ है कि अगर जांच में यह बात पूरी तरह साबित होती है, तो इमारत के मालिकों और प्रबंधन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या की बेहद सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज होना तय है।
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