
नई दिल्ली। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी की आवाज, वैश्विक जीडीपी में 40 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी, 11 सदस्य देश, 12 सहयोगी मुल्क और संयुक्त राष्ट्र (UN) सहित 5 बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन। यानी सरल शब्दों में कहें तो दो-तिहाई दुनिया की ताकत दिल्ली की जमीन पर एक साथ जुटी। राष्ट्रीय राजधानी में दो दिनों तक चले सघन कूटनीतिक विमर्श और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के 3 दिवसीय गहन मंथन के बाद ऐतिहासिक ‘दिल्ली घोषणा पत्र’ जारी कर दिया गया है। वैश्विक मंच पर भारत की यह कूटनीतिक जीत सिर्फ वादों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें साझा विकास, आर्थिक मजबूती और उज्ज्वल भविष्य के बुलंद इरादों की ठोस रूपरेखा साफ नजर आई।
जब बारूद के धुएं के बीच दिल्ली से गूंजा बुद्ध की शांति का संदेश
यह सम्मेलन ऐसे नाजुक दौर में आयोजित हुआ जब दुनिया के दो बड़े हिस्से युद्ध की आग में धधक रहे हैं और जंग के थपेड़ों से दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं बदहाल हैं। एक तरफ यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी दबाव झेल रहा रूस था, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारी तनातनी में फंसा ईरान। ऐसे वक्त में भारत ने ‘बुद्ध की शांति’ वाले संदेश के साथ इस महामंथन की अगुवाई की। तमाम विपरीत ध्रुवों के नेता भारत के आह्वान पर स्थिरता, पुनर्निर्माण और शांति की उम्मीद लेकर एक मेज पर बैठे, क्योंकि सभी को ब्रिक्स की नई वैश्विक धुरी और ताकत का बखूबी अहसास था।
घोषणा पत्र के 5 बड़े फैसले: आतंकवाद पर चोट, व्यापार में राहत
शिखर सम्मेलन के समापन पर जारी दिल्ली घोषणा पत्र में पांच ऐसे बड़े स्तंभ तय किए गए हैं, जो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा तय करेंगे:
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पहलगाम हमले की भर्त्सना और टेरर फंडिंग पर वार: आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए घोषणा पत्र में पहलगाम हमले का सीधा जिक्र किया गया। बिना किसी लाग-लपेट के टेरर फंडिंग की नकेल कसने और आतंकियों के वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करने पर सभी देशों ने सहमति की मुहर लगाई।
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सैन्य तनाव के बीच कमर्शियल रूट्स की सुरक्षा: एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों और युद्ध पर चिंता जताते हुए स्पष्ट किया गया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापारिक मार्गों (कमर्शियल शिपिंग रूट्स) की सुरक्षा सर्वोपरि है। जंग के हालातों में भी समुद्री रास्तों की रुकावटों को केवल शांतिपूर्ण कूटनीतिक बातचीत से हल करने पर जोर दिया गया।
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ग्लोबल वैल्यू चेन (2026-2030) और टैरिफ वॉर का विरोध: सदस्य देशों ने अपने घरेलू बाजारों को एक-दूसरे के लिए खोलने और आपसी व्यापारिक सहयोग को मजबूत करने के लिए वर्ष 2026 से 2030 तक का खाका तैयार किया। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर मनमाने ढंग से थोपे जाने वाले एकतरफा टैरिफ को वैश्विक विकास के लिए बड़ा खतरा मानते हुए गहरी चिंता जाहिर की गई।
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पर्यावरण निगरानी के लिए सैटेलाइट नेटवर्क: जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से निपटने के लिए तकनीक का सहारा लिया जाएगा। इसके तहत ‘ब्रिक्स रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन’ सहयोग समझौते को अंतिम मंजूरी दी गई, जिससे मौसम और पर्यावरणीय आपदाओं पर सटीक नजर रखी जा सकेगी।
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UNSC सुधार और ग्लोबल साउथ की मजबूत नुमाइंदगी: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पुराने ढांचे को बदलकर इसमें तत्काल सुधार करने की मांग उठाई गई। साथ ही, विकासशील और अल्पविकसित देशों (ग्लोबल साउथ) को वैश्विक निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्थाओं में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देने का संकल्प दोहराया गया।
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी जीत: बैकफुट पर दिखा ड्रैगन
दिल्ली के इस मंच पर भारत ने जिस तरह से कूटनीतिक बिसात बिछाई, उसने बीजिंग को भी कई अहम बिंदुओं पर झुकने पर मजबूर कर दिया। पाकिस्तान का नाम लिए बिना ही सही, लेकिन चीन ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करने और सीमा पार टेरर फंडिंग पर रोक लगाने वाले साझा दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर किए। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता और सुधारों पर रोड़ा अटकाने वाला चीन इस बार यूएनएससी पुनर्गठन की मांग का समर्थन करता दिखा।
तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में भी बीजिंग अब अपने डेटा, स्किल डेवलपमेंट, लोकल करेंसी फ्रेमवर्क और घरेलू बाजार को ब्रिक्स सहयोगियों के लिए लचीला बनाने पर राजी हुआ है। सुरक्षा, संप्रभुता और आर्थिक विस्तार के मोर्चे पर भारत ने इस सम्मेलन के जरिए एक ठोस जमीन तैयार कर दुनिया को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भविष्य के वैश्विक फैसले अब केवल चंद पश्चिमी ताकतों के इशारे पर नहीं होंगे।
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