Thursday , 23 July 2026

ओपन जेल में अनूठी शादी: हत्या के दो उम्रकैद की सजायाफ्ता कैदियों ने लिए सात फेरे, पुलिसकर्मी बने बाराती…जानिए कैसे शुरू हुई दोनों की प्रेम कहानी?

 जोधपुर।   राजस्थान की न्यायिक नगरी जोधपुर स्थित मंडोर ओपन जेल में प्रेम, पुनरुत्थान और मानवीय संवेदनाओं की एक बेहद अनोखी और ऐतिहासिक मिसाल देखने को मिली। हत्या के अलग-अलग मामलों में उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा काट रहे दो बंदी— मूलाराम और सीमा, एक-दूसरे के हमसफर बन गए। कोर्ट के आदेश पर बाकायदा दूल्हा बने मूलाराम और दुल्हन बनी सीमा ने वैदिक रीति-रिवाज से सात फेरे लेकर एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।

जेल अधिकारी और पुलिसकर्मी बने बाराती, फलोदी के शख्स ने किया कन्यादान

सादे माहौल में आयोजित इस अनूठे विवाह समारोह में केवल 21 लोग शामिल हुए, जिनमें मुख्य रूप से जेल प्रशासन के अधिकारी, कर्मचारी और सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी मौजूद रहे। दूल्हे की बारात में पुलिस जवानों ने गवाह और बाराती दोनों की भूमिका निभाई। वहीं, मुंबई से सीमा के परिजनों के न आ पाने पर, जेल में बनी उसकी एक सहेली के पिता राधाकिशन वागेला (निवासी फलोदी) ने आगे आकर पिता का फर्ज निभाया और कन्यादान की रस्म पूरी की।

कैसे शुरू हुई दोनों की प्रेम कहानी?

  • मूलाराम (दूल्हा): नागौर जिले के अडसिंगा का रहने वाला मूलाराम वर्ष 2017 में हुए एक हत्या के मामले में दोषी करार दिया गया था। अगस्त 2023 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अच्छे व्यवहार के चलते वह पिछले दो साल से मंडोर ओपन जेल में बतौर सरपंच सेवा दे रहा है।

  • सीमा घड़से (दुल्हन): मूल रूप से महाराष्ट्र की रहने वाली सीमा की शादी 2016 में जोधपुर में हुई थी। अनचाही शादी से परेशान होकर उसने पति की हत्या कर दी थी, जिसके लिए 2019 में कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

सजा काटने के दौरान दोनों को बेहतरीन आचरण के चलते राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश पर मंडोर स्थित खुली जेल (Open Jail) में ट्रांसफर किया गया था। यहाँ रहने के दौरान दोनों के बीच जान-पहचान हुई और उन्होंने साथ में नया जीवन शुरू करने का फैसला किया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने दी शादी और पैरोल की ऐतिहासिक मंजूरी

अपने पुनरुत्थान और नए जीवन की शुरुआत के लिए दोनों कैदियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने कैदियों के पुनर्वास, मानवाधिकारों और सुधारात्मक न्याय प्रणाली को ध्यान में रखते हुए शादी के लिए अस्थायी सजा निलंबन (पैरोल) की मंजूरी दी थी।

हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश के बाद सेंट्रल जेल अधीक्षक प्रमोद सिंह शेखावत और ओपन जेल प्रभारी हापू राम की देखरेख में विवाह की सभी तैयारियां पूरी की गईं। यह शादी इस बात का सबसे बड़ा सबूत बनी कि कानून व्यवस्था केवल सजा देने के लिए नहीं, बल्कि बंदियों को मुख्यधारा में वापस लाने और उन्हें सम्मानजनक जीवन का एक और मौका देने के लिए भी काम करती है।

Check Also

ज्ञानवापी विवाद : सीलबंद क्षेत्र में ‘शिवलिंग’ के दर्शन और जलाभिषेक की मांग, सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई; हिंदू पक्ष ने रखा यह प्रस्ताव

नई दिल्ली / वाराणसी।   वाराणसी स्थित ज्ञानवापी परिसर से जुड़े बहुचर्चित विवाद में एक बार …