Wednesday , 9 September 2026

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा: क्यों सोने की झाड़ू से साफ किया जाता है महाप्रभु का रास्ता? जानिए ‘छेरा पहंरा’ की ये अद्भुत रस्म

पुरी: सनातन धर्म और उत्कल संस्कृति में ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का एक विशिष्ट और बेहद पवित्र महत्व है। इस साल 16 जुलाई 2026 को महाप्रभु जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। नौ दिनों तक चलने वाले इस भव्य उत्सव से जुड़ी कई अलौकिक परंपराएं हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख और आकर्षित करने वाली परंपरा है ‘छेरा पहंरा’। इस रस्म के तहत रथ यात्रा के मार्ग और महाप्रभु के रथों की सोने की झाड़ू से सफाई की जाती है। आइए जानते हैं इस अद्भुत परंपरा के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य।

ब्रह्मांड के स्वामी के सामने आम सेवक हैं पुरी के राजा

‘छेरा पहंरा’ रस्म की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसे किसी आम सेवादार द्वारा नहीं, बल्कि पुरी के गजपति महाराज (शाही वंश के राजा) द्वारा स्वयं संपन्न किया जाता है। रथ यात्रा के पावन दिन गजपति महाराज पारंपरिक शाही पालकी में सवार होकर तीनों भव्य रथों के समीप पहुंचते हैं। वह सबसे पहले चतुर्धा मूरत के सामने पूरी श्रद्धा से शीश नवाते हैं। इसके बाद, वह अपने हाथों में एक विशेष सोने की झाड़ू थामते हैं और रथ के चबूतरे व उसके आसपास के रास्ते को साफ करते हैं। सफाई के उपरांत पूरे मार्ग पर सुगंधित जल और पवित्र पुष्पों की वर्षा की जाती है। यह दृश्य इस बात का जीवंत प्रमाण है कि संसार का राजा चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिपति भगवान जगन्नाथ के चरणों में महज एक साधारण सेवक है।

सत्ता और वैभव का अहंकार मिटाने का कालजयी संदेश

यह सदियों पुरानी रस्म मानव समाज से अहंकार और ऊंच-नीच की भावना को समूल नष्ट करने का एक अनुपम उदाहरण पेश करती है। जब प्रजा के सामने उनका राजा स्वयं हाथ में झाड़ू थामकर सफाईकर्मी की भूमिका में आ जाता है, तो पूरी दुनिया को यह मर्मस्पर्शी संदेश जाता है कि ईश्वर की अदालत में कोई बड़ा या छोटा नहीं है। सांसारिक पद, मान-प्रतिष्ठा और अपार धन-दौलत का अहंकार भगवान की अनन्य भक्ति के सामने पूरी तरह शून्य हो जाता है।

सामाजिक समरसता और एकजुटता का महासंगम

जगन्नाथ संस्कृति का मूल आधार ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और समानता की भावना है। इस महायात्रा में जाति, मत, पंथ या वर्ग का कोई स्थान नहीं रह जाता। जैसे ही गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रास्ता साफ कर अपनी सेवा पूर्ण करते हैं, वैसे ही वहां उपस्थित समाज के हर तबके के लाखों श्रद्धालु एक सुर में जयकारे लगाते हुए महाप्रभु के रथ की पवित्र रस्सियों को खींचने के लिए उमड़ पड़ते हैं। सदियों से निर्बाध रूप से चली आ रही यह अद्वितीय परंपरा सामाजिक समरसता और अटूट एकजुटता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

 

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