Sunday , 18 October 2026

यूपी पंचायत चुनाव पर बड़ा झटका: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यकाल खत्म होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले पर लगाई रोक, सरकार से मांगा जवाब!

(लखनऊ)। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर एक बहुत बड़ी कानूनी अड़चन सामने आ गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस विवादास्पद फैसले पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पुराने ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक (अल्टरनेटिव एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त कर दिया गया था। माननीय न्यायालय ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से असंवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिकूल करार दिया है। इस न्यायिक आदेश के बाद प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन को लेकर एक बार फिर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

अरविंद राठौर की याचिका पर हाईकोर्ट का कड़ा एक्शन: 13 जुलाई को अगली सुनवाई

यह महत्वपूर्ण आदेश अरविंद राठौर नाम के नागरिक द्वारा दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस शासनादेश (Government Order) को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें चुनाव टलने की स्थिति में निवर्तमान प्रधानों को ही वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सौंपने की वकालत की गई थी। लखनऊ खंडपीठ में इस मामले की तीखी बहस के बाद अदालत ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए आगामी 13 जुलाई तक इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ किया है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद किसी भी जनप्रतिनिधि को बिना चुनाव के पिछले दरवाजे से प्रशासनिक शक्तियां नहीं दी जा सकतीं।

57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतें प्रभावित: 26 मई को खत्म हो चुका है कार्यकाल

उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति और विकास कार्यों के लिहाज से यह फैसला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। दरअसल, सूबे की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में काबिज ग्राम प्रधानों का तय कार्यकाल बीते 26 मई 2026 को आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है। नियमतः इस तारीख से पहले पंचायत चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए थे, लेकिन विभिन्न तकनीकी कारणों और आरक्षण की उलझनों के चलते राज्य निर्वाचन आयोग समय पर चुनाव कराने में विफल रहा। इसी देरी को पाटने के लिए सरकार ने एक अस्थायी रास्ता निकालते हुए प्रधानों को ही प्रशासक की कुर्सी पर बिठा दिया था, जिसे अब कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया है।

हाईकोर्ट का राज्य निर्वाचन आयोग को अल्टीमेटम: मांगी चुनाव की पक्की तारीखें

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने न केवल सरकार के प्रशासनिक आदेश पर कैंची चलाई, बल्कि राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) को भी आड़े हाथों लिया। अदालत ने आयोग के वैधानिक दायित्वों की याद दिलाते हुए सख्त निर्देश दिया है कि वह अगली सुनवाई तक प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की संभावित समय-सीमा और पक्की तारीखों का पूरा खाका कोर्ट के सामने पेश करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों को लंबे समय तक बिना चुनी हुई सरकार या तदर्थ (Ad-hoc) व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर टिकीं नजरें: क्यों लेट हो रहे हैं यूपी में पंचायत चुनाव?

इस पूरे चुनावी स्थगन और देरी के पीछे की मुख्य वजह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण निर्धारण है। उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले का पालन करने के लिए एक विशेष ओबीसी आयोग का गठन किया है। यह आयोग वर्तमान में प्रदेश के सभी 75 जिलों का तूफानी दौरा कर रहा है ताकि ग्रामीण स्तर पर पिछड़े वर्गों की वास्तविक आबादी, उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक पिछड़ेपन का एक मुकम्मल डेटा तैयार किया जा सके। इसी सर्वे की फाइनल रिपोर्ट के आधार पर ग्राम पंचायतों में वार्डों और प्रधान पदों के लिए आरक्षण की नई नीति (Reservation Policy) तय की जाएगी।

6 महीने तक खिंच सकता है इंतजार: अब आगे क्या होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि ओबीसी आयोग की जमीनी कसरत, डेटा संकलन और उसके बाद आरक्षण की नई सूची जारी करने की इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम छह महीने का वक्त लग सकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि यूपी में पंचायत चुनाव साल 2026 के अंत तक खिंच सकते हैं। अब जबकि हाईकोर्ट ने कार्यवाहक प्रधानों से प्रशासनिक शक्तियां छीनने का आदेश दे दिया है, तो राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह गांवों के विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं को चालू रखने के लिए सरकारी अफसरों (जैसे एडीओ पंचायत या बीडीओ) को प्रशासक नियुक्त करे या कोर्ट में कोई नया वैधानिक विकल्प तलाशे। फिलहाल, 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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