लखनऊ। राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया इलाके में हुए भीषण अग्निकांड ने न सिर्फ 15 परिवारों की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं, बल्कि इस खौफनाक हादसे ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की कार्यप्रणाली और उसके भ्रष्ट तंत्र की भी कलई खोलकर रख दी है। इस दर्दनाक आग की चपेट में आने से अब तक 15 मासूम युवाओं की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें तीन युवतियां भी शामिल हैं। दर्दनाक बात यह है कि सभी मृतकों की उम्र महज 20 से 24 साल के बीच थी, जो अपने सुनहरे भविष्य के सपने लेकर यहाँ आए थे।
इस संवेदनशील मामले में पुलिस ने त्वरित और बड़ी कार्रवाई करते हुए छह नामजद आरोपियों समेत अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। अब तक तीन मुख्य आरोपियों रामकृष्ण उपाध्याय, वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और तुशांक कृष्णा जायसवाल को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस प्रशासन का साफ कहना है कि इस मामले में शामिल किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और आगे की विधिक कार्रवाई तेजी से जारी है।
आवासीय नक्शे पर कमर्शियल का खेल: एलडीए की नाक के नीचे हुआ बड़ा घोटाला
हादसे के बाद जो चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं, वे सीधे तौर पर प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करती हैं। जिस बहुमंजिला इमारत में यह भीषण आग लगी, उसका नक्शा एलडीए से ‘आवासीय भवन’ (Residential Building) के रूप में पास कराया गया था। लेकिन बाद में नियमों को ताक पर रखकर इस पूरी इमारत का उपयोग धड़ल्ले से कमर्शियल गतिविधियों के लिए किया जाने लगा।

रिहायशी नक्शे पर कमर्शियल कॉम्प्लेक्स
हैरानी की बात यह है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण की नाक के नीचे रिहायशी मानचित्र पर एक पूरा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स खड़ा हो गया, उसमें कोचिंग और गेमिंग जोन खुल गए, लेकिन प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते इस पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
2014 से चल रहा था अवैध धंधा: रसूखदारों के नाम दर्ज है यह ‘डेथ ट्रैप’
दस्तावेजों के मुताबिक, यह पूरी इमारत वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला की बताई जा रही है, जो रामेश्वरम इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालक भी है। एलडीए (LDA) के रिकॉर्ड के अनुसार, यह विवादित संपत्ति वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला के साथ उनके दो भाइयों सुरेंद्र शुक्ला और धीरेंद्र शुक्ला के नाम पर दर्ज है।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2014 से ही इस भवन का उपयोग पूरी तरह कमर्शियल रूप में किया जा रहा था, जबकि इसका मूल मानचित्र केवल आवासीय श्रेणी में स्वीकृत था। पिछले 12 सालों से चल रहे इस अवैध खेल पर एलडीए की खामोशी अब खुद जांच के घेरे में है। हादसे के बाद अब शासन स्तर पर यह जांच की जा रही है कि भवन के संचालन और उपयोग को लेकर क्या कभी कोई जरूरी अनुमति या फायर क्लीयरेंस ली भी गई थी या सब कागजों पर ही चल रहा था।
न इमरजेंसी एग्जिट, न वैकल्पिक रास्ता: घने धुएं ने बना दिया ‘मरणघर’
इस भीषण त्रासदी के बाद सबसे बड़ा और तीखा सवाल बिल्डिंग के सुरक्षा मानकों को लेकर उठ रहा है। व्यावसायिक गतिविधियों से गुलजार रहने वाली इस इमारत में न तो कोई इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन निकास) था और न ही पीछे की तरफ बाहर निकलने का कोई वैकल्पिक रास्ता दिया गया था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही बेसमेंट में आग लगी, पूरी इमारत में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपनी जान बचाने और धुएं से बचने के लिए पीछे की ओर भागे, लेकिन वहां बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। चारों तरफ से बंद कंक्रीट के इस ढांचे में चंद मिनटों में ही दमघोंटू जहरीला धुआं भर गया, जिसके कारण ज्यादातर मासूम बच्चों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया।
खिड़कियों से लटकते मासूम और एसी शॉर्ट सर्किट की आशंका
इस खौफनाक मंजर के कई रूह कंपा देने वाले वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह मासूम छात्र-छात्राएं अपनी जान बचाने के लिए खिड़कियों से रस्सियों और इंटरनेट के तारों के सहारे नीचे लटक रहे हैं। कई लोग जान बचाने की जद्दोजहद में ऊपरी मंजिलों से छलांग लगाने का प्रयास करते दिखे।
प्राथमिक तकनीकी जांच के अनुसार, आग लगने की मुख्य वजह बेसमेंट में लगे एसी (Air Conditioner) में हुआ भयंकर शॉर्ट सर्किट माना जा रहा है। हालांकि, फॉरेंसिक टीम और दमकल विभाग आग लगने के वास्तविक और सटीक कारणों की गहन जांच में जुटे हैं।
मुख्यमंत्री ने किया मुआयना: तत्कालीन अफसरों और इंजीनियरों पर गिरेगी गाज
हादसे की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने खुद घटनास्थल का दौरा किया और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को बेहद सख्त लहजे में निर्देश दिए हैं कि पूरे मामले की गहराई से जांच कर दोषियों पर ऐसी कार्रवाई की जाए जो नजीर बने। उन्होंने साफ कहा कि तत्कालीन अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका की भी स्क्रूटनी की जा रही है, जिनकी तैनाती के दौरान यह अवैध कमर्शियल कॉम्प्लेक्स फला-फूला।
अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, हादसे के बाद कुल 21 से 22 लोगों को इमरजेंसी वार्ड में लाया गया था, जिनमें से 15 युवाओं को मृत अवस्था में ही लाया गया था। फिलहाल 5 गंभीर घायलों का इलाज डॉक्टरों की विशेष निगरानी में चल रहा है। दो युवा इमारत से नीचे कूदने के कारण गंभीर रूप से चोटिल हुए हैं, जिनकी कमर में फ्रैक्चर है और उनका सीटी स्कैन कर इलाज किया जा रहा है। इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर लखनऊ में चल रहे अवैध निर्माणों और सुरक्षा मानकों की निगरानी करने वाले सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
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