Friday , 18 September 2026

यूपी में 21% दलित वोट पर मची सियासी जंग: सपा, कांग्रेस और भाजपा में किसे मिलेगा 2027 का बंपर फायदा?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सियासी रण में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पार्टी सुप्रीमो मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के बीच लगातार बनती-बिगड़ती दूरियां, वरिष्ठ नेता अशोक सिद्धार्थ पर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और उत्तराधिकार को लेकर पार्टी के भीतर जारी ऊहापोह ने बसपा को गहरे संगठनात्मक भंवर में धकेल दिया है। इस अंदरूनी उठापटक का सीधा असर सूबे के लगभग 21 फीसदी दलित मतदाताओं पर पड़ रहा है, जिसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्ता की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है।

सात साल में 13% घटा वोट बैंक, 2024 में खाली हाथ रही बसपा दलित वोट बैंक दशकों तक बसपा की रीढ़ रहा है, लेकिन हालिया चुनावी आंकड़े पार्टी के खिसकते आधार की साफ गवाही दे रहे हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 22.2 फीसदी वोट हासिल करने वाली बसपा का जनाधार 2024 के आम चुनाव में घटकर महज 9.39 फीसदी पर सिमट गया। यानी महज सात वर्षों के भीतर पार्टी का वोट शेयर 13 प्रतिशत अंक से अधिक गिर गया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुला। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि बसपा का यह पारंपरिक वोट बैंक अब किस पाले में खड़ा होगा?

2019 का SP-BSP गठबंधन: जाटव बसपा संग रहे, सपा को नहीं हुआ मनमुताबिक लाभ साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने ढाई दशक पुरानी कटुता भुलाकर ऐतिहासिक गठबंधन किया था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर किस्मत आजमाई, जिसमें गठबंधन को कुल 15 सीटें (बसपा को 10 और सपा को 5) मिलीं। उस चुनाव में बसपा का वोट शेयर 19.43 फीसदी और सपा का 18.11 फीसदी था। हालांकि, मतदान के बाद सामने आए आंकड़ों से साफ हुआ कि 74 फीसदी जाटव मतदाताओं ने गठबंधन को समर्थन तो दिया, लेकिन उनका झुकाव मुख्य रूप से बसपा प्रत्याशियों की ओर था। जिन सीटों पर सपा उम्मीदवार मैदान में थे, वहां दलित वोट उसी सहजता से सपा को ट्रांसफर नहीं हुआ। इसके उलट, गैर-जाटव दलितों का 60 फीसदी हिस्सा सीधे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ चला गया और सपा को गठबंधन का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका।

2024 में पलटी बाजी: गैर-जाटव दलितों ने थामा सपा-कांग्रेस का हाथ साल 2024 के लोकसभा चुनाव में परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। बसपा जहां ‘एकला चलो’ की राह पर रही, वहीं सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनावी बिगुल फूंका। नतीजे अप्रत्याशित रहे—सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतकर कुल 43 सीटों पर परचम लहराया, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। सीएसडीएस (CSDS) के सर्वे आंकड़ों के अनुसार, बसपा का 44 फीसदी जाटव वोट बैंक अब भी मायावती के साथ मजबूती से खड़ा दिखा, लेकिन सपा-कांग्रेस को 25 फीसदी और भाजपा को 24 फीसदी जाटव वोट मिला। सबसे बड़ा उलटफेर गैर-जाटव दलितों के रुख में दिखा, जहां 56 फीसदी मतदाताओं ने सपा-कांग्रेस गठबंधन पर भरोसा जताया। इस वर्ग से भाजपा को 29 फीसदी और बसपा को सिर्फ 15 फीसदी वोट ही मिल पाए।

संविधान और आरक्षण का नैरेटिव बना टर्निंग पॉइंट 2024 के चुनाव में गैर-जाटव दलितों के विपक्ष की ओर जाने की सबसे बड़ी वजह चुनावी नैरेटिव में आया बदलाव था। विपक्ष ने इस बार चुनाव को संविधान रक्षा, आरक्षण, जातीय जनगणना और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सवालों पर केंद्रित कर दिया। राहुल गांधी द्वारा लगातार उठाए गए सामाजिक न्याय के मुद्दों ने दलित और पिछड़े वर्गों को यह भरोसा दिलाया कि यह मुकाबला महज सरकार बदलने का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी की सुरक्षा का है।

कांग्रेस के लिए ऐतिहासिक मौका, संगठन में भी दलित चेहरों को तरजीह कांशीराम और मायावती के उभार के दौर में कांग्रेस से उसका पारंपरिक दलित आधार पूरी तरह छिन गया था। अब बसपा के ढलान पर आते ही कांग्रेस इस खाली जगह को भरने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। पार्टी न सिर्फ चुनावी मंचों से सामाजिक न्याय की बात कर रही है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे में भी दलित नेतृत्व को आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे स्वयं इस वर्ग का बड़ा चेहरा हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि वह दलित समुदाय को वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए गंभीर है।

सपा का PDA मॉडल और जमीनी हकीकत की चुनौतियां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दलित मतदाताओं को जोड़ने के लिए ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दिया। बसपा के कई कद्दावर दलित चेहरों को पार्टी में शामिल करने से लेकर बाबा साहब वाहिनी के गठन तक कई प्रयोग किए गए। हालांकि, ग्रामीण उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरणों के चलते जमीनी स्तर पर दलितों और सपा के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही कारण है कि दलित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा सपा के मुकाबले कांग्रेस के साथ जुड़ने में ज्यादा सहज महसूस कर रहा है।

भाजपा के लिए खतरे की घंटी: बिखराव या एकतरफा ध्रुवीकरण? भाजपा ने 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में पासी, धोबी, कोरी, वाल्मीकि और खटीक जैसी गैर-जाटव जातियों को अपने पाले में लाकर अभूतपूर्व सफलता हासिल की थी। 2019 में 60 फीसदी गैर-जाटव दलित भाजपा के साथ थे, जो 2024 में गिरकर 29 फीसदी पर आ गए। 2024 में सपा-कांग्रेस (43.5%) और एनडीए (43.7%) का वोट शेयर लगभग बराबर रहा था। भाजपा के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा यह है कि यदि बसपा का करीब 9.4 फीसदी वोट बैंक 2027 में पूरी तरह विपक्षी गठबंधन की ओर शिफ्ट हो गया, तो सत्ता की राह बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। हालांकि, यदि यह वोट सपा, कांग्रेस, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (ASP) और बसपा के बीच बंटता है, तो भाजपा को सीधा लाभ मिल सकता है।

2027 का सियासी चक्रव्यूह: आकाश आनंद का असमंजस और वोट ट्रांसफर की जंग बसपा में आकाश आनंद को लेकर नेतृत्व का अनिश्चित रवैया दलित युवाओं को भ्रमित कर रहा है। कभी उत्तराधिकारी घोषित होना, फिर हटाया जाना और दोबारा किनारे किए जाने से बसपा के पास किसी मजबूत युवा चेहरे का अभाव दिख रहा है। चंद्रशेखर आजाद तेजी से दलित युवाओं के बीच अपनी पहचान बना रहे हैं। 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव महज राजनीतिक दलों की हार-जीत का नहीं, बल्कि इस बात का फैसला करेगा कि उत्तर प्रदेश का 21 फीसदी दलित मतदाता अपना नया और स्थायी राजनीतिक ठिकाना किसे चुनता है।

 

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