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VIDEO….4 मिनट का वो दिव्य क्षण: जब सूर्य की किरणों ने चूमा रामलला का मस्तक…पीएम मोदी ने देखा अद्भुत नजारा

अयोध्या। आज पूरा देश राममय है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव ‘रामनवमी’ के पावन अवसर पर रामनगरी अयोध्या में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसे देखकर करोड़ों भक्तों की आंखें सजल हो गईं। शुक्रवार (27 मार्च 2026) को ठीक दोपहर 12 बजे अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रामलला का ‘सूर्य तिलक’ संपन्न हुआ। विज्ञान और आस्था के इस अनूठे संगम ने न केवल अयोध्या, बल्कि पूरे विश्व को मंत्रमुग्ध कर दिया।

4 मिनट का वो दिव्य क्षण: जब सूर्य की किरणों ने चूमा रामलला का मस्तक

भगवान राम सूर्यवंशी हैं और शास्त्रों के अनुसार उनका जन्म दोपहर 12 बजे अभिजीत मुहूर्त में हुआ था। इसी परंपरा को जीवंत करते हुए, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक (मिरर और विशेष लेंस की व्यवस्था) के माध्यम से सूर्य देव की किरणों को सीधे रामलला के मस्तक पर केंद्रित किया गया। लगभग 4 मिनट तक प्रभु के ललाट पर सूर्य की किरणें एक चमकते हुए तिलक के रूप में विराजमान रहीं। मंदिर परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूंज उठा और भक्त इस अलौकिक दृश्य को देखकर भावविभोर हो गए।

पीएम मोदी ने देखा लाइव टेलीकास्ट, तालियां बजाकर किया नमन

रामलला के इस भव्य सूर्य तिलक के साक्षी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बने। पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री आवास से इस पूरे घटनाक्रम का सीधा प्रसारण (Live Telecast) देखा। जैसे ही सूर्य की किरणों ने रामलला का अभिषेक किया, पीएम मोदी ने हाथ जोड़कर नमन किया और उत्साह में तालियां बजाईं। उन्होंने इस पल को करोड़ों भारतीयों के लिए गौरव और आस्था का चरमोत्कर्ष बताया।

14 पुजारियों ने की विशेष पूजा, अब लगेगा 56 भोग

सूर्य तिलक के इस विशेष अवसर पर मंदिर के गर्भगृह में 14 मुख्य पुजारी मौजूद रहे। सूर्य अभिषेक के तुरंत बाद विशेष आरती की गई। इसके पश्चात परंपरा के अनुसार कुछ समय के लिए रामलला के पट बंद कर दिए गए हैं। अब प्रभु को 56 तरह के व्यंजनों का महाभोग लगाया जाएगा, जिसके बाद भक्तों के लिए दर्शन पुनः सुचारू रूप से शुरू होंगे।

क्यों खास है सूर्य तिलक? जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीराम का जन्म सूर्यवंश में हुआ था और सूर्यदेव उनके कुल देवता हैं। सूर्य को सृष्टि में जीवन और शक्ति का स्रोत माना जाता है। रामनवमी पर सूर्य तिलक का होना इस बात का प्रतीक है कि स्वयं कुल देवता अपने वंशज का राज्याभिषेक कर रहे हैं। यह परंपरा त्रेतायुग की याद दिलाती है, जब सूर्यदेव ने प्रभु के जन्म पर अपनी गति रोक दी थी।

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