Friday , 15 May 2026

पंजाब फतह करने के लिए बीजेपी ने बुना ‘बंगाल मॉडल’ वाला चक्रव्यूह….क्या 6 साल बाद फिर एक होंगे ‘अकाली दल और बीजेपी’?  

चंडीगढ़: पश्चिम बंगाल के सियासी समर में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब पंजाब के राजनीतिक रणक्षेत्र में भी वैसा ही बड़ा करिश्मा दोहराने की तैयारी में पूरी ताकत से जुट गई है। अगले साल यानी 2027 के फरवरी-मार्च महीने में पंजाब समेत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने निर्धारित हैं। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब को छोड़कर बाकी के चारों राज्यों में बीजेपी पहले से ही सत्ता की कमान संभाल रही है। पंजाब में बीजेपी अतीत में क्षेत्रीय दल शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का हिस्सा तो रही है, लेकिन अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ वह कभी भी सत्ता के शीर्ष तक नहीं पहुंच पाई है। साल 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ पंजाब की सत्ता पर कब्जा जमाया था, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अब उसके वजूद और भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं।

सात राज्यसभा सांसदों की बगावत और गुटबाजी: ‘आप’ के सामने गहराया अस्तित्व का संकट

पंजाब की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के लिए मौजूदा समय सबसे बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा का साबित हो रहा है। पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल हो जाने, केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी (ED) की लगातार बढ़ती ताबड़तोड़ कार्रवाई और आंतरिक गुटबाजी ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार के लिए भारी संकट खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि इन विपरीत परिस्थितियों में ‘आप’ के लिए पंजाब में अपने मौजूदा विधायकों को एकजुट रख पाना बेहद टेढ़ी खीर साबित होने वाला है। दिल्ली में पहले ही सत्ता गंवा चुकी आम आदमी पार्टी के लिए अब पंजाब का किला बचाना साख का सवाल बन चुका है, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में बने रहने के लिए पंजाब की अहमियत उसके लिए सबसे ज्यादा है।

कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और नशे के मुद्दे पर भगवंत मान सरकार की चौतरफा घेराबंदी

हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव, 2024 के लोकसभा चुनाव और हालिया उपचुनावों में बीजेपी को पंजाब की धरती पर कोई खास चुनावी कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन इसके बावजूद पार्टी ने राज्य में अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। रक्षात्मक रहने के बजाय बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की तर्ज पर पंजाब के लिए एक बिल्कुल आक्रामक और अलग रणनीति तैयार की है:

  • भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था: बीजेपी ने पंजाब में कानून-व्यवस्था के लचर हालात को लेकर भगवंत मान सरकार की तगड़ी घेराबंदी शुरू कर दी है। सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं और हाल ही में पंजाब सरकार के एक कद्दावर मंत्री पर भी जांच का शिकंजा कसा है।

  • नशे का मुद्दा: राज्य में सालों से नासूर बन चुकी नशे की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है, जिसे बीजेपी आगामी विधानसभा चुनाव में एक बहुत बड़ा चुनावी हथियार बनाने जा रही है।

  • अधूरे वादे: जिस तरह बंगाल में बीजेपी ने टीएमसी को महिला सुरक्षा और तुष्टिकरण पर घेरा था, ठीक उसी तरह पंजाब में बीजेपी स्थानीय मुद्दों को हवा दे रही है। पार्टी का सीधा आरोप है कि आम आदमी पार्टी ने पिछले चुनाव में महिलाओं से जो बड़े-बड़े वादे किए थे, उन्हें पूरा करने में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है।

हालांकि, कृषि कानूनों के विवाद के कारण पंजाब के ग्रामीण और किसान बहुल इलाकों में बीजेपी के खिलाफ जो भारी नाराजगी और विरोध देखा गया था, उससे पार पाना पार्टी के लिए अब भी एक बड़ी चुनौती है।

राघव चड्ढा और संदीप पाठक का दलबदल; ‘आप’ के सांगठनिक ढांचे को ढहाने का मेगा प्लान

पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर तब देखने को मिला जब ‘आप’ के प्रमुख रणनीतिकार और थिंक टैंक माने जाने वाले राघव चड्ढा और संदीप पाठक समेत छह बड़े राज्यसभा सांसद पाला बदलकर बीजेपी के खेमे में चले गए। बीजेपी अब इन कद्दावर नेताओं के जरिए आम आदमी पार्टी के जमीनी संगठनात्मक ढांचे को पूरी तरह से तोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रहे ये नेता अब हर रोज मीडिया और जनसभाओं में ‘आप’ की नीतियों पर तीखे हमले बोल रहे हैं। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को पूरा भरोसा है कि इन रणनीतिकारों की मदद से पार्टी राज्य के उन हिस्सों में भी अपना जनाधार बढ़ाने में कामयाब होगी जहां वह पारंपरिक रूप से कमजोर थी। अब देखना यह होगा कि चुनाव की औपचारिक घोषणा होने तक आम आदमी पार्टी के बाकी बचे नेता एकजुट रह पाते हैं या बिखर जाते हैं?

क्या 6 साल बाद फिर एक होंगे ‘अकाली दल और बीजेपी’? पर्दे के पीछे खिचड़ी पकना शुरू

पंजाब की सियासत का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि क्या छह वर्षों के लंबे अलगाव के बाद बीजेपी और उसका सबसे पुराना सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (SAD) एक बार फिर हाथ मिलाएंगे? साल 2020 में तीन कृषि कानूनों के विवादित मुद्दे पर दोनों दलों का दशकों पुराना गठबंधन टूट गया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी दोनों के साथ आने की पुरजोर चर्चा चली थी, लेकिन सीटों के तालमेल और शर्तों पर बात नहीं बन सकी।

अब राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से इन दोनों पुराने साथियों को करीब लाने की पर्दे के पीछे से कोशिशें होती दिखाई दे रही हैं। हालांकि, रणनीतिक तौर पर जनता के सामने दोनों ही दलों के बड़े नेता फिलहाल यही दावा कर रहे हैं कि वे पंजाब की सभी विधानसभा सीटों पर अकेले और अलग-अलग चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में संभावनाओं के दरवाजे कभी बंद नहीं होते, और आगामी चुनाव की घोषणा तक पंजाब का यह सियासी ऊँट किस करवट बैठेगा, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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