पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) में जारी भारी सैन्य तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल-गैस की सप्लाई बाधित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए एक विशाल महाप्रोजेक्ट पर काम तेज कर दिया है। तकरीबन 40,000 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सफल होने पर आने वाले कई दशकों तक भारत में एलएनजी और प्राकृतिक गैस की किल्लत हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। कूटनीतिक और रक्षा गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, केंद्र सरकार खाड़ी देशों से निर्बाध गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ओमान से सीधे गहरे समुद्र के रास्ते भारत तक एक मेगा गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना को तेजी से आगे बढ़ा रही है।
ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया के उथल-पुथल से सबक, ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर (Energy Dependent Country) है। देश में इस्तेमाल होने वाले तेल और गैस का एक बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी के देशों से ही आयात किया जाता है। ऐसे में ईरान युद्ध और वेस्ट एशिया में मचे हालिया उथल-पुथल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और ईंधन की कीमतों पर पड़ रहा था। इसी भू-राजनीतिक संकट को भांपते हुए केंद्र सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। अनुमान है कि करीब 40 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाली इस ओमान-भारत पाइपलाइन परियोजना को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद इसे पूरा होने में 5 से 7 साल का समय लग सकता है।
स्पॉट मार्केट की मनमानी से मिलेगी मुक्ति, 2030 तक दोगुनी होगी गैस की मांग
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, भारत अब अंतरराष्ट्रीय एलएनजी (LNG) के स्पॉट बाजारों की मनमानी और अत्यधिक निर्भरता से पूरी तरह बाहर निकलना चाहता है। भारत में फैक्ट्रियों, गाड़ियों और घरों में प्राकृतिक गैस की मांग लगातार रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रही है।
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वर्तमान खपत: देश में अभी प्रतिदिन करीब 190-195 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की खपत हो रही है।
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2030 का अनुमान: सरकार के एनर्जी-मिक्स बढ़ाने के प्रयासों के कारण 2030 तक यह मांग बढ़कर 290-300 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन पहुंचने का अनुमान है।
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आयात पर निर्भरता: इसी अवधि तक भारत का एलएनजी आयात भी 180-200 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है, जिसे इस सुरक्षित पाइपलाइन के जरिए पूरा किया जाएगा।
संवेदनशील रास्तों को छोड़ अरब सागर से गुजरेगा रूट, 6 देशों के खजाने पर होगी नजर
इस महापरियोजना का रूट (Project Route) इस तरह वैज्ञानिक और रणनीतिक रूप से तैयार किया जाएगा कि यह ओमान और यूएई के रास्ते सीधे अरब सागर के तल से होकर भारत पहुंचे। इससे भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील और युद्धग्रस्त क्षेत्रों से पूरी तरह बचा जा सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इस सिंगल समुद्री पाइपलाइन के जरिए भारत को ओमान, यूएई, सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर जैसे दुनिया के सबसे बड़े गैस उत्पादक देशों के विशाल गैस भंडार तक सीधी और सुरक्षित पहुंच मिल सकेगी। इन खाड़ी देशों के पास संयुक्त रूप से करीब 2,500 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस का अटूट भंडार मौजूद है।
समुद्र के नीचे 3,450 मीटर गहराई पर बनेगा रिकॉर्ड, दोगुनी कीमतों से बचेगा भारत
यह प्रोजेक्ट इंजीनियरिंग की दुनिया में एक नया इतिहास रचने जा रहा है। यह पाइपलाइन अरब सागर में समुद्र की सतह से करीब 3,450 मीटर की बेतहाशा गहराई तक बिछाई जा सकती है, जिससे यह पूरी दुनिया की सबसे गहरी समुद्री पाइपलाइन परियोजनाओं (Deepest Underwater Pipeline) में शीर्ष पर शामिल हो जाएगी।
इस परियोजना को इतनी तेजी से आगे बढ़ाने के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में आया अचानक उछाल है। दरअसल, होर्मुज संकट के दौरान एशियाई स्पॉट एलएनजी कीमतों का प्रमुख इंडेक्स ‘प्लैट्स जेकेएम’ (Platts JKM) सामान्य दिनों के 10-12 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से सीधे उछलकर 24-25 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू तक पहुंच गया था। इस मूल्य वृद्धि ने भारत के बजट और घरेलू बाजार को बड़ा झटका दिया था। अब इस अंडरवाटर पाइपलाइन के बन जाने से भारत को हमेशा के लिए स्थिर कीमतों पर बिना रुके गैस मिलती रहेगी।
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