Tuesday , 7 July 2026

38 साल बाद जेल से छूटा देश का सबसे पुराना कैदी; 2 पत्नियों और मासूम बेटी का कातिल, बाहर आकर बोला- ‘हत्याओं का कोई…

ऊंची जेल की दीवारों, कड़े पहरे और लोहे की भारी सलाखों के पीछे अपने जीवन के लगभग चार दशक (38 साल) काटने के बाद, जब 72 साल के साईबन्ना एन. नाटिकर के कदम धीरे-धीरे बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल के मुख्य गेट से बाहर निकले, तो हर कोई उन्हें देखता रह गया। सिर के लंबे सफेद बाल, बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी और वक्त के थपेड़ों से झुकी हुई काया साफ बयां कर रही थी कि सलाखों के पीछे समय ने उन्हें कितना बदल दिया है। जेल की चहारदीवारी से बाहर निकलने के बाद साईबन्ना ने आज़ादी की पहली खुली सांस तो ली, लेकिन उनके चेहरे पर पिछले 38 सालों के गुनाहों की वो खौफनाक परछाइयां साफ नजर आ रही थीं, जिसे वे चाहकर भी अपनी किस्मत से अलग नहीं कर सकते।

भारत का सबसे लंबे समय तक जेल में रहने वाला कैदी

कर्नाटक जेल विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, साईबन्ना एन. नाटिकर को पूरे देश में सबसे लंबे समय तक जेल की सज़ा काटने वाला कैदी माना गया है। जेल महानिदेशक (DGP) आलोक कुमार ने इस मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि उन्होंने साईबन्ना को अपने सेवाकाल के दौरान बेलगावी और कलबुर्गी की जेलों में भी देखा था। उनका कहना है कि इतने दशकों तक जेल के अंदर साईबन्ना का व्यवहार हमेशा बेहद अनुशासित, शांत और नियमों के मुताबिक रहा। हालांकि, जेल की फाइलों में दर्ज यह अनुशासन उस खौफनाक अतीत को नहीं मिटा सकता, जिसने उन्हें जवानी में सलाखों के पीछे धकेला था।

जब सिर्फ शक के चलते साईबन्ना ने ली अपनी ही दो पत्नियों और बेटी की जान

साईबन्ना के जेल पहुंचने और फिर कभी बाहर न निकल पाने की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। साल 1988 में साईबन्ना पर अपनी पहली पत्नी मलकव्वा की बेरहमी से हत्या करने का आरोप लगा था। साईबन्ना को शक था कि उसकी पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग (अफेयर) चल रहा है। इसी सनक और शक के चलते उसने मलकव्वा को मौत के घाट उतार दिया, जिसके बाद अदालत ने उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

इसके बाद साल 1994 में साईबन्ना को जेल से पैरोल मिली। जेल से बाहर आने के बाद उसने समाज में नए सिरे से जीने की कोशिश की और दूसरी शादी कर ली। कुछ ही समय में उसके घर एक नन्हीं बेटी ने जन्म लिया, जिसका नाम विजयलक्ष्मी रखा गया। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद साईबन्ना के सिर पर फिर से वही शक और पुराना पागलपन सवार हो गया। उसने अपनी दूसरी पत्नी नागम्मा और अपनी ही चंद महीनों की मासूम बेटी विजयलक्ष्मी पर धारदार हथियार से हमला कर दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी। इस बार भी वजह पत्नी पर चरित्रहीनता का शक ही था।

रोंगटे खड़े करने वाला बयान: ‘हत्याओं का कोई खास अफ़सोस नहीं’

जेल जाने से पहले कोऑपरेटिव सेक्टर में अच्छी-खासी नौकरी करने वाले सायबन्ना के तेवर आज भी हैरान करने वाले हैं। जेल से रिहा होने के बाद उसने अपनी इस कृत्य पर पश्चाताप करने के बजाय कहा कि इन हत्याओं के कारण उसकी अच्छी नौकरी चली गई और उसकी 10 एकड़ पैतृक जमीन भी हाथ से निकल गई। उसका दावा है कि आज के समय में उस ज़मीन की कीमत 1 करोड़ रुपये से कहीं ज़्यादा होती। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जीवन के 38 साल जेल की कालकोठरी में काटने के बाद भी उसने मीडिया के सामने कहा कि उसकी पत्नियों की बेवफ़ाई के उसके पास पक्के सबूत थे, इसलिए उसे इन हत्याओं का आज भी कोई खास अफ़सोस नहीं है।

कोर्ट से मिली थी मौत की सज़ा, फिर ऐसे बदला कानून का फैसला

साल 2003 में एक निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने इस दोहरे हत्याकांड की क्रूरता और वहशीपन को देखते हुए साईबन्ना को फांसी (मौत की सज़ा) सुनाई थी। हालांकि, बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उसकी सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। साईबन्ना की मौजूदा रिहाई में एक बड़ा कानूनी मोड़ तब आया जब कोर्ट के संज्ञान में यह बात आई कि उसने जेल के भीतर लगभग एक दशक (10 साल) का समय ‘अकेले कैद’ (सॉलिटरी कन्फाइनमेंट) में बिताया है। हाई कोर्ट ने इसे पूरी तरह गैर-कानूनी और अमानवीय माना। इसके साथ ही, उसकी दया याचिका पर फैसला आने में हुई अत्यधिक देरी का सीधा फायदा भी उसे मिला, जिसके चलते पूरे 37-38 साल बाद उसे जेल से रिहा करने का आदेश जारी किया गया।

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