प्रयागराज। माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग की टीजीटी (TGT) अंग्रेजी परीक्षा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। परीक्षा में कुल 125 प्रश्नों में से 33 सवाल गलत और आउट ऑफ सिलेबस (पाठ्यक्रम से बाहर) पूछे जाने के गंभीर आरोपों पर सुनवाई करते हुए अदालत ने आयोग की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने हैरानी जताते हुए पूछा कि क्या आयोग के पास ऐसा कोई सिस्टम या मैकेनिज्म नहीं है, जो टॉस के जरिए प्रश्नपत्र चुनने के बजाय उनकी सत्यता और विश्वसनीयता की जांच कर सके?
अधिकारियों को किया तलब, सीलबंद लिफाफे में पेश हुआ हलफनामा
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने चयन आयोग के सचिव और परीक्षा नियंत्रक को व्यक्तिगत रूप से तलब किया था। दोनों अधिकारियों ने कोर्ट में पेश होकर एक हलफनामा दाखिल किया, जिसमें प्रश्नपत्र तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का ब्योरा दिया गया। इसके अलावा, जिन प्राइवेट एजेंसियों से प्रश्नपत्र सेट करवाए जाते हैं, उनके साथ हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का ड्राफ्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश किया गया। आयोग के अधिवक्ता के. शाही ने दलील दी कि अलग-अलग एजेंसियों से पेपर बनवाए जाते हैं, जहां दो एजेंसियां दो-दो सेट तैयार करती हैं और फिर अध्यक्ष महोदय उनमें से किसी एक का रैंडम चयन करते हैं।
टॉस से पेपर चुनने पर भड़का हाईकोर्ट: 50% सवाल गलत हुए तो क्या पूरी परीक्षा रद्द होगी?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आयोग की इस लचर प्रणाली पर सख्त नाराजगी जताई। अदालत ने पूछा कि एजेंसियों द्वारा दिए गए सवाल सही हैं या गलत, इसे जांचने की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है? कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि 125 में से लगभग 25 प्रतिशत (33 प्रश्न) सवाल गलत या बाहर से हैं और कल को 50 प्रतिशत सवाल गलत निकल आएं, तो क्या आयोग पूरी परीक्षा रद्द कर देगा? इस पर आयोग के वकील ने सफाई दी कि गलत प्रश्नों के अंक सभी अभ्यर्थियों में समान रूप से बांट दिए जाते हैं और दोषी एजेंसी पर प्रति गलत सवाल एक लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
पारदर्शिता की कमी और ब्लैकलिस्ट करने की मांग
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि आयोग के कामकाज में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि अभ्यर्थियों को इस आंतरिक प्रक्रिया का पता नहीं होता और इसका फायदा गलत लोग उठाते हैं। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि सिर्फ आर्थिक जुर्माना ही क्यों, क्या ऐसी एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट करने की कोई व्यवस्था है? वहीं, अभ्यर्थियों की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा ने आरोप लगाया कि आयोग यह स्पष्ट नहीं कर रहा है कि वे 33 विवादित प्रश्न कौन से हैं।
17 अगस्त तक 8 विवादित प्रश्नों का ब्योरा देने का आदेश
आयोग की ओर से तर्क दिया गया कि छात्रों की आपत्तियों की समीक्षा के बाद 25 सवाल आउट ऑफ सिलेबस पाए गए हैं, जबकि 8 सवाल सही पाए गए हैं। इस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने मांग की कि आयोग उन 8 प्रश्नों की जानकारी भी सार्वजनिक करे ताकि अगर उनमें भी कोई गड़बड़ी हो तो अभ्यर्थी अपनी आपत्ति दर्ज करा सकें। कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए आयोग को 17 अगस्त तक वे 8 प्रश्न अभ्यर्थियों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
भविष्य के लिए ठोस कदम उठाने की हिदायत, 1 सितंबर को अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने आयोग के सचिव को सख्त हिदायत दी है कि वे भविष्य में इस तरह की गंभीर गलतियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग क्या प्रक्रिया अपनाता है, इसमें कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन सुधार अनिवार्य है। मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का समय देते हुए पीठ ने अगली सुनवाई की तारीख 1 सितंबर तय की है।
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