नई दिल्ली। देश की राजनीति के गलियारों में इस वक्त महिला आरक्षण बिल को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। लोकसभा में दो दिनों की मैराथन बहस और भारी गहमागहमी के बाद आखिरकार शुक्रवार को यह बिल गिर गया। सदन में एक ओर जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए पूरा जोर लगा रहे थे, वहीं विपक्षी दलों के हंगामे ने सदन की तस्वीर ही बदल दी। इस पूरी सियासी जंग के केंद्र में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव रहे, जिनके एक फैसले ने यूपी से लेकर दिल्ली तक नई बहस छेड़ दी है।
विरोध में वोटिंग: अखिलेश का PDA फॉर्मूला या राजनीतिक जोखिम?
अखिलेश यादव के लिए यह बिल महज एक कानून नहीं, बल्कि उनके नए राजनीतिक समीकरण ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है। अखिलेश ने सदन में साफ तौर पर कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं है, लेकिन उन्होंने इस बिल के खिलाफ वोट डालकर सबको चौंका दिया। अखिलेश की मांग बेहद स्पष्ट है—वे ‘कोटा के भीतर कोटा’ चाहते हैं। उनका तर्क है कि जब तक देश की 95 फीसदी आबादी वाली ओबीसी, दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण सुनिश्चित नहीं होता, तब तक यह बिल उनके लिए बेमानी और केवल एक दिखावा है।
जातिगत जनगणना पर अड़ी सपा, बीजेपी को घेरा
सपा सांसदों ने सदन में सरकार की ‘जल्दबाजी’ पर गंभीर सवाल उठाए। अखिलेश यादव का आरोप है कि भाजपा सरकार असली आंकड़ों को छिपाने के लिए जातिगत जनगणना से भाग रही है। उन्होंने दो टूक कहा कि पहले देश में जाति आधारित जनगणना हो, ताकि आबादी के सही अनुपात में महिलाओं को उनका हक मिल सके। सपा का मानना है कि जनगणना और परिसीमन के नाम पर सरकार केवल इस मुद्दे को टालने की कोशिश कर रही है, जो कि पिछड़ों के साथ अन्याय है।
इतिहास ने खुद को दोहराया: मुलायम सिंह की यादें हुई ताजा
दिलचस्प बात यह है कि आज अखिलेश यादव जिस राह पर हैं, कभी उनके पिता और सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने भी वही रुख अपनाया था। साल 2010 में भी महिला आरक्षण बिल मुलायम सिंह के कड़े विरोध की वजह से ही परवान नहीं चढ़ सका था। उस समय भी मुलायम सिंह का यही तर्क था कि बिना ओबीसी और मुस्लिम कोटे के यह बिल पिछड़ों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को खत्म कर देगा। हालांकि, उस फैसले के बाद सपा पर ‘महिला विरोधी’ होने का ठप्पा लगा था, जो आज भी अखिलेश के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
बीजेपी के ‘महिला विरोधी’ नैरेटिव में फंसने का डर?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बिल का विरोध करके अखिलेश यादव ने अपने लिए नई मुसीबतें मोल ले ली हैं। अब बीजेपी इसे बड़ा मुद्दा बनाकर अखिलेश को ‘महिला विरोधी’ और ‘प्रगति का दुश्मन’ साबित करने की कोशिश करेगी। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब हैं और वहां महिला साइलेंट वोटर्स का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर झुकता रहा है। ऐसे में भाजपा इस मुद्दे को चुनावी रैलियों में भुनाने से पीछे नहीं हटेगी।
परिसीमन का डर और बदलता वोट बैंक
अखिलेश के विरोध के पीछे केवल सामाजिक न्याय ही नहीं, बल्कि परिसीमन का डर भी छिपा है। यदि परिसीमन के बाद यूपी में सीटों की संख्या बदलती है, तो पूरे राज्य का राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकता है। अखिलेश को अंदेशा है कि इससे भाजपा को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। अब देखना यह होगा कि अखिलेश का यह ‘PDA’ दांव उन्हें 2027 की चुनावी वैतरणी पार कराता है या फिर यह उनके वोट बैंक को उनसे और दूर ले जाएगा।
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