Friday , 17 April 2026

अल नीनो का साया : 2026 में सूखे की आहट! मानसून को लेकर मौसम विभाग की डरावनी भविष्यवाणी, क्या खाली रह जाएंगे देश के जल भंडार?

नई दिल्ली: भारत के लिए मानसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों किसानों की उम्मीदों का आधार है। लेकिन इस साल प्रशांत महासागर से आ रहे संकेत अच्छे नहीं हैं। मौसम विभाग (IMD) के ताजा अनुमान के मुताबिक, अल नीनो (El Niño) के मजबूत होने के कारण 2026 में भारत का मानसून ‘सामान्य से नीचे’ रह सकता है। अगर अप्रैल का यह अनुमान सटीक बैठता है, तो देश को भीषण जल संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।

92 फीसदी पर सिमट सकता है मानसून: 2023 के बाद फिर बढ़ी चिंता

मौसम विभाग के अनुसार, इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून अपनी लंबी अवधि के औसत (LPA) का महज 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है। साल 2023 के बाद यह पहला मौका होगा जब मानसून की स्थिति इतनी कमजोर रहने की आशंका जताई गई है। निजी मौसम एजेंसियों ने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा है कि जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश एलपीए का करीब 94 फीसदी ही रह सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही आंकड़ों में यह कमी छोटी लगे, लेकिन बारिश का ‘असमान वितरण’ (कहीं कम, कहीं ज्यादा) हालात को बदतर बना सकता है।

खेती और पीने के पानी पर संकट: 65% धान क्षेत्र में सूखे का डर

भारत पहले से ही पानी की किल्लत से जूझ रहा है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश का 74 फीसदी गेहूं उगाने वाला क्षेत्र और 65 फीसदी धान उत्पादन क्षेत्र पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है। मानसून कमजोर रहने का सीधा मतलब है फसलों की बर्बादी और पीने के पानी के लिए हाहाकार। जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह (जल पुरुष) का कहना है कि व्यावसायिक फसलों की बढ़ती मांग ने हमें मानसून पर और अधिक निर्भर बना दिया है, ऐसे में बारिश की कमी देश की खाद्य सुरक्षा को हिला सकती है।

भूजल का गिरता स्तर और जल सुरक्षा पर बढ़ता दबाव

भारत में सिंचाई के लिए लगभग 62 फीसदी निर्भरता भूजल (Groundwater) पर है। लेकिन हकीकत यह है कि आधे से ज्यादा इलाकों में भूजल का स्तर खतरनाक ढंग से नीचे गिर रहा है। अनुमान है कि 2030 तक खेती के लिए पानी की मांग और उसकी उपलब्धता के बीच 570 अरब घन मीटर का भारी अंतर हो सकता है। कम बारिश की स्थिति में नदियों और बांधों के सूखने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे बिजली उत्पादन और औद्योगिक इकाइयों पर भी बुरा असर पड़ता है।

भीषण गर्मी और वाष्पीकरण: दोहरी मार झेलेंगे किसान

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मानसून कमजोर रहता है और तापमान में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो पानी का वाष्पीकरण (Evaporation) तेज हो जाएगा। इससे मिट्टी की नमी खत्म हो जाएगी और फसलों के शुरुआती चरणों (बुआई और फूल आने के समय) में भारी नुकसान होगा। दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के जानकारों के अनुसार, इस साल मानसून का सही समय पर और सही वितरण में होना बेहद जरूरी है, वरना देश को एक बड़े जल संकट के लिए तैयार रहना होगा।

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