Tuesday , 8 September 2026

SC-ST Act Compensation: एक ही परिवार को मिले ₹23 लाख, 12 दावे अभी बाकी; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे UP में जांच के दिए सख्त आदेश

प्रयागराज। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पीड़ितों को मिलने वाली वित्तीय सहायता और मुआवजे की व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को पूरे राज्य में व्यापक स्तर पर जांच कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच का मकसद यह पता लगाना है कि राहत राशि के दावे और उनके भुगतान की मौजूदा कार्यप्रणाली क्या है और क्या कोई एक ही व्यक्ति अथवा उसका परिवार बार-बार इस कानूनी प्रावधान के तहत मुआवजे का दावा कर रहा है।

एक ही परिवार को लाखों का मुआवजा, 10-12 दावे अभी भी कतार में यह अहम आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए पारित किया। सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह चौंकाने वाला तथ्य आया कि अधिवक्ता संतोष कुमार दोहरे और उनके परिजनों को विभिन्न आपराधिक मुकदमों में अब तक कुल 23 लाख 36 हजार 250 रुपये बतौर राहत राशि मिल चुकी है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने अदालत को अवगत कराया कि इसी परिवार से जुड़े करीब 10 से 12 अन्य मामलों में राहत राशि के दावे अभी भी जिला स्तरीय समिति के पास विचाराधीन हैं।

सिस्टम की पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी: हाईकोर्ट मुकदमों और मुआवजे के दावों के इस सिलसिले पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा बार-बार केस दर्ज कराना और वित्तीय सहायता मांगना अपने आप में कानून का दुरुपयोग साबित नहीं करता। हालांकि, मुकदमों की तादाद और मुआवजे के दावों की लगातार पुनरावृत्ति ऐसी स्थिति पैदा करती है, जिसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच बेहद जरूरी है। पीठ ने रेखांकित किया कि SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाली राहत राशि वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कल्याणकारी कदम है, इसलिए इसकी साख और विश्वसनीयता से कोई समझौता नहीं हो सकता।

झांसी DM और SSP को 3 माह की मोहलत, पूरे प्रदेश में अलर्ट अदालत ने झांसी के जिलाधिकारी को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के साथ मिलकर इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल करने का निर्देश दिया है। जांच टीम को दर्ज मुकदमों की सत्यता, मांगी गई और जारी की गई मुआवजे की कुल राशि तथा किन परिस्थितियों में ये दावे किए गए, इन सभी पहलुओं की बिंदुवार रिपोर्ट तैयार करनी होगी। अदालत ने इसके लिए तीन महीने की समयसीमा तय की है।

सरकारी खजाने से भुगतान से पहले अनिवार्य सत्यापन का आदेश हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिए हैं कि समूचे राज्य में एक ऐसी पुख्ता व्यवस्था बनाई जाए, जिससे सरकारी खजाने से राहत राशि जारी करने से पहले पर्याप्त भौतिक सत्यापन सुनिश्चित हो सके। ऐसे मामलों पर विशेष निगरानी तंत्र विकसित करने को कहा गया है जहां एक ही पक्ष बार-बार राहत राशि का दावा कर रहा हो। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस जांच का आशय किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं है और न ही इस कवायद के चलते किसी भी वास्तविक और जरूरतमंद पीड़ित को उसके कानूनी हक से वंचित किया जाना चाहिए।

 

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