Wednesday , 29 April 2026

कराची में ‘मौत’ के गुब्बारों से जल रहा चूल्हा: ईरान-अमेरिका तनाव ने रसोई तक पहुंचाया संकट, जान जोखिम में डालकर गैस भरने को मजबूर लोग

कराची: ईरान और अमेरिका के बीच गहराते युद्ध और क्षेत्रीय तनाव की तपिश अब आम आदमी की रसोई तक पहुंच गई है। पाकिस्तान का आर्थिक केंद्र कहा जाने वाला कराची शहर इस वक्त एक ऐसे ऊर्जा संकट की गिरफ्त में है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और सुरक्षा के सभी पैमानों को ध्वस्त कर दिया है। शहर की घनी बस्तियों में रसोई गैस की भारी किल्लत के चलते लोग अब अपनी जान हथेली पर रखकर ‘प्लास्टिक के गुब्बारों’ में गैस स्टोर करने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों ने इन गैस से भरे बैग्स को ‘चलता-फिरता बम’ करार दिया है, जो किसी भी वक्त एक बड़े नरसंहार का कारण बन सकते हैं।

ओरंगी टाउन और मोमिनाबाद में हाहाकार

कराची के ओरंगी टाउन और मोमिनाबाद जैसे इलाकों में पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस का दबाव (Pressure) न के बराबर रह गया है। एआरवाई न्यूज (ARY News) की रिपोर्ट के मुताबिक, दिन भर चूल्हे ठंडे रहने के कारण लोगों की दिनचर्या पटरी से उतर गई है। सुबह-सुबह जब कुछ मिनटों के लिए गैस आती है, तो लोग इलेक्ट्रिक सक्शन पंप का इस्तेमाल कर उसे खींचते हैं और बड़े-बड़े प्लास्टिक बैग्स में भर लेते हैं। ये बैग्स बाजार में 1000 से 1500 रुपये में धड़ल्ले से बिक रहे हैं।

घरों में रखा है ‘मौत का सामान’

सुरक्षा जानकारों का कहना है कि प्लास्टिक के इन गुब्बारों में गैस भरना और उन्हें संकरी गलियों वाले छोटे कमरों में रखना सीधे तौर पर मौत को दावत देना है। प्लास्टिक बैग्स में गैस के रिसाव का खतरा हमेशा बना रहता है। हल्का सा घर्षण (Friction), बीड़ी-सिगरेट की चिंगारी या बिजली के स्विच से निकलने वाला स्पार्क इन बैग्स को पल भर में ‘मिसाइल’ बना सकता है। यदि किसी एक घर में धमाका हुआ, तो संकरी गलियों के कारण पूरा मोहल्ला मलबे के ढेर में तब्दील हो सकता है।

ईरान-अमेरिका तनाव का ‘किचन’ पर असर

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ब्लॉक करने की धमकियों और अमेरिकी प्रतिबंधों ने पाकिस्तान की गैस सप्लाई चेन को पूरी तरह तोड़ दिया है। आयातित एलएनजी (LNG) की कमी और बढ़ती कीमतों के कारण सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को गैस देने में नाकाम साबित हो रही है। कराची के नागरिकों का कहना है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है—या तो वे इस खतरे के साथ जिएं या फिर भूखे मरें। फिलहाल, प्रशासन ने इस खतरनाक ट्रेंड पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है, जिससे बड़े हादसे का डर बना हुआ है।

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