नई दिल्ली/बीजिंग: इजराइल-ईरान युद्ध की आग अब दुनिया की रसोई और गाड़ियों के टैंक तक पहुंचती दिख रही है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की घेराबंदी ने वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचा दिया है। स्थिति यह है कि दुनिया के दो सबसे बड़े तेल आयातक देश—भारत और चीन—अब ‘रूसी कच्चे तेल’ के लिए आमने-सामने आ गए हैं। कल तक जो बीजिंग और नई दिल्ली सऊदी अरब के भरोसे थे, आज वे रूसी तेल के हर एक बैरल के लिए एक-दूसरे से बोली (Bidding) लगा रहे हैं।
होर्मुज में ‘ब्रेक’ और रूस की ओर मुड़ा रुख
ईरान और अमेरिका के बीच ठप पड़ी बातचीत और खाड़ी देशों के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों ने मिडिल ईस्ट से होने वाली सप्लाई को लगभग ठप कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध से पहले चीन होर्मुज के रास्ते रोजाना 44.5 लाख बैरल तेल मंगाता था, जो अप्रैल में सिमटकर मात्र 2.2 लाख बैरल रह गया है। भारत की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है; भारत का आयात 28 लाख बैरल से गिरकर 2.4 लाख बैरल पर आ गया है। इस भारी कमी ने दोनों देशों को रूस की ओर रुख करने पर मजबूर कर दिया है।
चीन का पलड़ा भारी: भारत के पास केवल 30 दिनों का स्टॉक
ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भारत के मुकाबले चीन अधिक सुरक्षित स्थिति में नजर आ रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो चीन के पास करीब 3 से 4 महीने का तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) मौजूद है, जबकि भारत के पास केवल 30 दिनों का बफर स्टॉक है। भारत में पेट्रोल-डीजल की मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है। ऐसे में भारत को “किसी भी कीमत पर” तेल की जरूरत है, जिसका फायदा उठाकर चीन ऊंची बोली लगाकर भारत के हाथ से रूसी खेप छीनने की कोशिश कर रहा है।
सऊदी अरब में भी चीन की ‘सेंध’, भारत की बढ़ी टेंशन
चुनौती सिर्फ रूसी तेल तक सीमित नहीं है। भारत के पारंपरिक सहयोगी सऊदी अरब में भी चीन ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। सऊदी अरब ने चीन की रिफाइनरियों में भारी निवेश किया है, जिसके चलते अप्रैल में सऊदी ने चीन को 13.5 लाख बैरल तेल भेजा। भारत, जो सऊदी अरब से अपना आयात बढ़ाने की योजना बना रहा था, अब वहां भी चीन की प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है।
रूस का रुख: ‘अवैध दबाव’ के बीच भारत को साथ रखने की कोशिश
तमाम अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के बावजूद रूस ने भारत का साथ देने का संकेत दिया है। भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने स्पष्ट किया कि रूस, भारत के साथ अपना सहयोग जारी रखना चाहता है। उन्होंने पश्चिमी देशों की पाबंदियों को ‘अवैध’ करार दिया है। हालांकि, हकीकत यह है कि जून की खेपों के लिए चीन ने अभी से ही आक्रामक बोली लगानी शुरू कर दी है, जिससे आने वाले दिनों में भारत के लिए रूसी तेल खरीदना और भी महंगा और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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