Tuesday , 21 April 2026

बड़ा फैसला: क्या शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपराध है? जानिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक ऐसा क्रांतिकारी फैसला सुनाया है, जो समाज की परंपरागत सोच और कानूनी व्याख्या के बीच की लकीर को और स्पष्ट करता है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी रजामंदी से लिव-इन में रहता है, तो इसे कानून की नजर में अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय के मंदिर में ‘सोशल मोरैलिटी’ (सामाजिक नैतिकता) की दीवार खड़ी नहीं की जा सकती, क्योंकि कानून और नैतिकता दो भिन्न विषय हैं।

क्या है पूरा विवाद: ऑनर किलिंग के खौफ में था जोड़ा

यह मामला शाहजहांपुर के एक प्रेमी जोड़े अनामिका और नेत्रपाल से जुड़ा है। दोनों एक साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे, लेकिन इस रिश्ते से महिला का परिवार सख्त नाराज था। परिजनों का तर्क था कि चूंकि नेत्रपाल पहले से शादीशुदा है, इसलिए यह रिश्ता पूरी तरह गैर-कानूनी और अनैतिक है। विवाद इतना बढ़ा कि जोड़े को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। अपनी जान बचाने और ‘ऑनर किलिंग’ के डर से इस कपल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली और सुरक्षा की गुहार लगाई।

अदालत की बड़ी टिप्पणी: सजा देने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है, जिसके तहत एक शादीशुदा पुरुष को किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से रहने पर सजा दी जा सके। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अदालतों का प्राथमिक कर्तव्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि भले ही समाज इसे अनैतिक माने, लेकिन जब तक कानूनन कोई उल्लंघन नहीं होता, तब तक बालिगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के ‘शक्ति वाहिनी’ केस का दिया हवाला

कोर्ट को जानकारी दी गई कि महिला ने पहले ही पुलिस प्रशासन को सूचित कर दिया था कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से नेत्रपाल के साथ रह रही है। इसके बावजूद उसे सुरक्षा नहीं मिल रही थी। इस पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि दो बालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और पुलिस प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को व्यक्तिगत रूप से निर्देश दिया कि वे इस जोड़े की सुरक्षा का पूरा जिम्मा उठाएं।

गिरफ्तारी पर रोक और परिवार को सख्त हिदायत

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता अनामिका और नेत्रपाल को बड़ी राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। इसके साथ ही महिला के परिजनों को कड़ी चेतावनी दी गई है कि वे इस जोड़े के जीवन में किसी भी प्रकार का दखल न दें और न ही उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश करें। अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई के लिए 8 अप्रैल, 2026 की तारीख मुकर्रर की है।

अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का भी जिक्र किया, जो हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। कोर्ट का मानना है कि शादी करना या किसी के साथ रहना व्यक्ति का निजी चुनाव है। बिना शादी के साथ रहने मात्र से किसी नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला आने वाले समय में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कई अन्य विवादों के लिए नजीर साबित होगा।

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