Saturday , 23 May 2026

अमेरिका-सऊदी को पछाड़ भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना यह देश, अगले हफ्ते होने जा रही है ‘महाडील’….पढ़ें इनसाइड स्टोरी 

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के गलियारे से भारत के लिए एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। वैश्विक भू-राजनीति में आए एक जबरदस्त यू-टर्न के बीच, केवल दो महीने पहले तक जिस देश से भारत एक बूंद कच्चा तेल भी आयात नहीं कर रहा था, उसने मई के महीने में अमेरिका और सऊदी अरब जैसे दिग्गज तेल उत्पादक देशों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। यह देश अब सीधे भारत को सबसे ज्यादा तेल सप्लाई करने वाले देशों की सूची में तीसरे पायदान पर आ खड़ा हुआ है। हम बात कर रहे हैं उस देश की, जो कभी भारत को सबसे सस्ता क्रूड ऑयल बेचा करता था— यानी वेनेजुएला।

रूस और UAE के बाद वेनेजुएला की धमाकेदार एंट्री

वैसे तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने वेनेजुएला से तेल की खरीद अप्रैल के महीने से ही दोबारा शुरू कर दी थी, लेकिन मई में इस आयात ने रफ्तार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस महीने वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद हर रोज 4,17,000 बैरल से भी अधिक के स्तर पर पहुंच गई है। इस धमाकेदार उछाल के साथ ही वेनेजुएला अब रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बाद भारत को तेल सप्लाई करने वाला तीसरा सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार बन गया है। भारतीय तेल बाजार में अब उससे आगे सिर्फ रूस और यूएई ही बचे हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री के दावे से मंचा हड़कंप, अगले हफ्ते भारत आ रहीं डेल्सी रोड्रिग्ज

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ अगले हफ्ते आने वाला है। वेनेजुएला की राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज अगले सप्ताह भारत के आधिकारिक दौरे पर आ रही हैं। माना जा रहा है कि इस बेहद अहम दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग और तेल आयात को लेकर एक ऐतिहासिक ‘महाडील’ पर मुहर लग सकती है। दिलचस्प बात यह है कि इस आगामी दौरे और बड़ी डील की सुगबुगाहट काराकास (वेनेजुएला) से नहीं, बल्कि वॉशिंगटन से आई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने खुद इस पूरे मामले की जानकारी साझा की है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों को हैरान कर दिया है।

दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार की हकीकत और अमेरिकी प्रतिबंधों का इतिहास

अगर तेल के खेल को समझना है, तो वेनेजुएला की ताकत को जानना होगा। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार (Oil Reserve) है, जो 300 बिलियन बैरल से भी अधिक आंका गया है। यह भंडार कितना विशाल है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यह अमेरिका, रूस और सऊदी अरब के कुल सामूहिक तेल भंडार से भी कहीं ज्यादा है। लेकिन, इस कहानी का सबसे पेचीदा हिस्सा सिर्फ तेल का कुआं होना नहीं है, बल्कि इसके पीछे की टाइमिंग है। सवाल उठ रहा है कि वेनेजुएला की इस वापसी की खबरें खुद अमेरिका से क्यों लीक हो रही हैं? इसके तार इस साल की शुरुआत में हुए उस बड़े घटनाक्रम से जुड़े हैं, जब वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को काराकास से एक विशेष सैन्य अभियान के जरिए अमेरिका उठा ले गया था। अमेरिका ने वर्षों से वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे थे, जिसके चलते भारत ने वहां से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया था।

वॉशिंगटन का ‘ग्रीन सिग्नल’ और अमेरिका की दोहरी चाल

तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वेनेजुएला का तेल भारत पहुंचने लगा? अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे अमेरिका की एक सोची-समझी ‘ग्रीन सिग्नल पॉलिटिक्स’ काम कर रही है। अमेरिका इस समय दो मोर्चों पर गेम खेल रहा है। पहला— वह चाहता है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की किल्लत न हो ताकि अंतरराष्ट्रीय कीमतें काबू में रहें। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण— अमेरिका नहीं चाहता कि भारत जैसा दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से रूस पर निर्भर हो जाए। यही वजह है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल निर्यात पर कुछ रणनीतिक ढील दी, जिसका फायदा उठाते हुए भारतीय रिफाइनर्स ने तुरंत अपनी खरीद बढ़ा दी। हालांकि, यह ढील बिना किसी अमेरिकी फायदे के नहीं है। भारत भले ही वेनेजुएला से तेल खरीद रहा है, लेकिन उस पूरी व्यवस्था पर वित्तीय और रणनीतिक निगरानी अमेरिकी तंत्र की ही है। यही वजह है कि राष्ट्रपति के भारत दौरे और ट्रेड ट्रैकिंग से जुड़ा हर बड़ा अपडेट अमेरिकी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के जरिए ही दुनिया के सामने आ रहा है।

रूसी तेल की चमक के बीच क्यों पड़ी वेनेजुएला की जरूरत?

भारत अपनी घरेलू जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में एक डॉलर की भी ऊंच-नीच सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, आम आदमी की जेब और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर डालती है। रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद भारत ने रूस से भारी डिस्काउंट पर रिकॉर्ड तोड़ तेल खरीदा। लेकिन कूटनीति का नियम है कि कभी भी सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए। रूस पर अपनी अति-निर्भरता को संतुलित करने के लिए भारत लगातार दूसरे सुरक्षित और सस्ते विकल्पों की तलाश में था, जहां वेनेजुएला एकदम फिट बैठ गया। यदि भविष्य में अमेरिका रूसी तेल पर प्रतिबंधों को और कड़ा करता है, जिससे पेमेंट और शिपिंग में दिक्कत आए, तो भारत के पास वेनेजुएला के रूप में एक बेहद मजबूत और आजमाया हुआ विकल्प तैयार रहेगा।

मिडल-ईस्ट संकट: सऊदी अरब और इराक से क्यों घटा आयात?

भारत द्वारा वेनेजुएला का रुख करने की एक बड़ी वजह मध्य-पूर्व (Middle-East) में उपजा गंभीर सैन्य तनाव भी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार को ट्रैक करने वाली फर्म ‘केप्लर’ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘होर्मुज स्ट्रेट’ (Strait of Hormuz) से शिपमेंट का आवागमन लगभग ठप पड़ गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल फरवरी में इराक से भारत को 9,69,000 बैरल प्रति दिन तेल मिल रहा था, जो मई में घटकर महज 51,000 बैरल प्रति दिन रह गया है। वहीं, सऊदी अरब— जो फरवरी तक भारत का तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर था— उसने न सिर्फ अपनी कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी की, बल्कि होर्मुज संकट के चलते उसकी सप्लाई भी अप्रैल के 6,70,000 बैरल से घटकर मई में आधी यानी 3,40,000 बैरल प्रति दिन पर सिमट गई है। सऊदी अरब से होने वाले आयात में 40% से अधिक की यह भारी गिरावट ही वेनेजुएला के लिए भारतीय बाजार में गेम चेंजर साबित हुई।

पेट्रोलियम मंत्रालय की होलिया रिपोर्ट्स भी तस्दीक करती हैं कि भारत अब किसी एक देश या क्षेत्र के भरोसे रहने के मूड में नहीं है। नई दिल्ली इस समय अपनी ऊर्जा सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए दुनिया के करीब 40 अलग-अलग देशों से कच्चे तेल की खरीदारी कर रही है, जिसमें अब रूस और मिडल-ईस्ट के साथ वेनेजुएला की भी किंग साइज वापसी हो चुकी है।

Check Also

मॉडल ट्विशा शर्मा मौत मामला: आरोपी पति समर्थ सिंह आज भोपाल कोर्ट में होगा पेश, पुलिस मांगेगी 7 दिन की रिमांड; पूर्व जज सास को हाईकोर्ट का नोटिस

भोपाल  : मॉडल ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले में आज का दिन बेहद …