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हिमालय में बढ़ता खतरा: ग्लेशियर पिघलने से बनी झीलें, टूटते ही मचती है भीषण तबाही, पढ़ें क्या कहती है ये रिपोर्ट

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-आईआईटी रुड़की के ग्लेशियोलॉजिस्ट ने किया अध्ययन, ऑटोमेटेड तरीका किया तैयार

नई दिल्ली । हाई माउंटेन एशिया दुनिया का वह इलाका है जहां सबसे ज्यादा ऊंचाई वाली झीलें हैं। ये झीलें ग्लेशियरों के पिघलने से बनी हैं। हाल ही में एक अध्ययन ने सैटेलाइट की मदद से इन झीलों की पूरी इन्वेंटरी बनाई गई। उनके बदलावों का पता लगाया गया है। आईआईटी रुड़की के ग्लेशियोलॉजिस्ट ने यह अध्ययन किया है। अध्ययन के मुताबिक 2022 में हिमालय में 31,698 हिमनदी झीलें पाई गईं, जिनका कुल क्षेत्रफल 2,240 वर्ग किलोमीटर था। ये झीलें मुख्य रूप से 4,000 से 5,400 मीटर की ऊंचाई पर हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियोलॉजिस्ट ने बताया कि ये ग्लेशियल झीलें पूर्वी हिमालय में सबसे ज्यादा क्षेत्र कवर करती हैं। 2016 और 24 के बीच झीलों के क्षेत्र में 5.5फीसदी की कुल बढ़ोतरी पाई। किलियन शान इलाके में सबसे ज्यादा 22.5फीसदी बढ़ोतरी हुई, जबकि पामीर में सिर्फ 2.9फीसदी। वैज्ञानिकों ने एक पूरी तरह ऑटोमेटेड तरीका विकसित किया है, जिसमें लैंडसैट-8, सेंटिनेल-1, सेंटिनेल-2 और कोपरनिकस डिजिटल एलिवेशन मॉडल जैसे ओपन-सोर्स सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल किया गया। यह तरीका पुराने तरीकों से बेहतर है, क्योंकि इसकी सटीकता 96फीसदी से ज्यादा है, खासकर छोटी झीलों को पहचानने में।

यह हिमालय जैसे तेजी से बदलते इलाकों में झीलों की नियमित निगरानी के लिए उपयोगी है। इससे ग्लेशियल झीलों के फटने की आपदाओं को समझने और रोकने में मदद मिलेगी। इन झीलों की संख्या और आकार बढ़ने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही हैं। पुरानी झीलें फैल रही हैं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 1950 से हीटवेव और तापमान बढ़ने से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। हिमालय में मॉनसून के बदलते पैटर्न, ज्यादा बारिश और गर्मी से मेल्टवाटर बढ़ रहा है। मानवीय गतिविधियां जैसे डिफॉरेस्टेशन और बांध बनाना भी समस्या बढ़ा रही हैं। पिछले दशकों में इनकी संख्या बढ़ी है, क्योंकि झीलें अस्थिर हो रही हैं।

जानकारी के मुताबिक भविष्य में ये झीलें और ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं। आपदा से अचानक बाढ़ आ सकती है, जो गांवों, सड़कों, पुलों और बांधों को नष्ट कर सकती है। इससे लैंडस्लाइड, नदियों में बाढ़ और पर्यावरण को नुकसान होगा। पानी की कमी भी हो सकती है, क्योंकि ग्लेशियर सिकुड़ रही हैं। ये 1.4 अरब लोगों को पानी सप्लाई करती हैं। कृषि, हाइड्रोपावर और पीने के पानी पर असर पड़ेगा। अगर तापमान और बढ़ा तो झीलें और फैलेंगी। अध्ययन कहता है कि एंडीज जैसे इलाकों में खतरा हिमालय से भी ज्यादा हो सकता है। इससे जैव विविधता खो सकती है।

आपदाएं से दुनिया भर में 1.5 करोड़ लोग खतरे में हैं। इनमें से 93 लाख हिमालय क्षेत्र में रहते हैं। भारत में करीब 30 लाख, पाकिस्तान में 20 लाख और चीन में भी लाखों लोग प्रभावित हैं। हिमालय में 10 लाख लोग झीलों से सिर्फ 10 किमी दूर रहते हैं, जहां चेतावनी का समय बहुत कम होता है। पिछले 190 सालों में हिमालय में आपदा से 7,000 से ज्यादा मौतें हुई हैं। 2013 में उत्तराखंड केदारनाथ में 6,000 मौतें। 2023 में सिक्किम में 46 मौतें और 88,400 लोग प्रभावित।

अगर ये आपदाएं बढ़ीं, तो लाखों लोग विस्थापित हो सकते हैं। यह स्टडी हमें चेतावनी देती है कि हिमालय जैसे इलाकों में निगरानी बढ़ानी होगी। सैटेलाइट टेक्नोलॉजी से पहले से खतरे का पता लगाकर जान-माल बचाया जा सकता है। यह सिर्फ एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि ग्लोबल चैलेंज है।

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