
विशेष संवाददाता, मुजफ्फरनगर वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान शामली के लांक गांव में 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला सकूरन की गैर इरादतन हत्या के बहुचर्चित मामले में अदालत ने सभी आठ आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी अनुराग पंवार की अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष मामले में दर्ज दो अलग-अलग प्राथमिकियों के अंतर्विरोध, मेडिकल हिस्ट्री में विसंगतियों और घटना के तथ्यों को कोर्ट में साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
सात सितंबर 2013 के बाद भड़का था दंगा, आठ सितंबर को हुआ था हमला नंगला मंदौड़ महापंचायत के बाद सात सितंबर 2013 की रात क्षेत्र में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। इसके अगले दिन यानी आठ सितंबर को लांक गांव में बुजुर्ग सकूरन पर कथित तौर पर धारदार हथियारों से हमला किया गया था, जिसमें उनके सिर पर गंभीर चोट आई। पुलिस सुरक्षा के बीच घायल महिला को पहले शामली स्वास्थ्य केंद्र और फिर जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। बाद में उपचार के दौरान महिला की मौत हो गई थी। घटना के संबंध में मृतका के बेटे युसूफ सैफी की तहरीर पर 21 अक्तूबर को लांक निवासी वीरेंद्र, विकास, अंकुर, जगपाल, अरविंद, मोहित, अनुज, संदीप और बागपत के सुन्हेड़ा निवासी दीपक के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कराया गया था।
ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मौत, पांच गवाह हुए पेश पुलिस ने विवेचना पूरी करने के बाद आरोपियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या सहित संबंधित धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया था। मामले की सुनवाई के दौरान लांक में रिश्तेदारी में रह रहे आरोपी दीपक की मौत हो गई। आठ अगस्त 2017 को न्यायालय द्वारा आठ आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पांच गवाह पेश किए गए, लेकिन वे अदालत में आरोपियों की संलिप्तता और अपराध को संदेह से परे साबित नहीं कर सके।
दो अलग-अलग एफआईआर और मेडिकल रिपोर्ट की कड़ियों में दिखा विरोधाभास न्यायालय ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि सबूतों की कड़ियां टूट जाने के कारण आरोप सिद्ध नहीं हो सके। घटना को लेकर दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई गई थीं—एक वादी युसूफ सैफी द्वारा और दूसरी कैराना राहत शिविर में रह रहे साजिद की ओर से। दोनों मामलों की संयुक्त जांच में कई विरोधाभासी तथ्य सामने आए। घायल सकूरन को नौ सितंबर को जिला अस्पताल लाया गया था, जहां 12 सितंबर को परिजन अपनी मर्जी से उन्हें रेफर कराकर ले गए। इसके बाद 21 अक्तूबर को कैराना में महिला की मौत होने तक के बीच की कोई मेडिकल हिस्ट्री रिकॉर्ड पर नहीं मिली। इसके अलावा खुद वादी और उसकी पत्नी ने भी अदालत में घटना के प्रत्यक्षदर्शी होने से इन्कार कर दिया।
नौ हमलावर लेकिन चोट केवल एक, अदालत ने माना संदिग्ध अदालत के समक्ष सबसे अहम तथ्य पोस्टमार्टम और पंचायतनामे की रिपोर्ट बनी। पंचनामे और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका के सिर पर दाहिनी आंख के ऊपर केवल एक ही चोट का उल्लेख था। अदालत ने विचार किया कि यदि नौ हमलावरों ने धारदार हथियारों से जानलेवा हमला किया होता, तो मृतका के शरीर पर कई गंभीर चोटें आना स्वाभाविक था। नौ आरोपियों के धारदार हथियार से हमले के दावे और मृतका को आई मात्र एक चोट के बीच गहरा विरोधाभास पाया गया। किसी प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के न होने और मेडिकल रिपोर्ट से अभियोजन की कहानी मेल न खाने के चलते अदालत ने सभी आठों आरोपियों को दोषमुक्त करने का आदेश दिया।
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