Friday , 30 October 2026

पंजाब में फिर दिखेगी ‘अकाली-भाजपा’ की पुरानी जोड़ी! दिवाली बाद बठिंडा में PM मोदी की रैली से हो सकता है बड़ा ऐलान, जानें सीटों का फॉर्मूला

चंडीगढ़। पंजाब की सियासत में एक बार फिर बड़े सियासी फेरबदल की आहट तेज हो गई है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के बीच गठबंधन की राह लगभग पूरी तरह साफ मानी जा रही है। सूत्रों की मानें तो दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो दिवाली के ठीक बाद श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व (गुरु नानक जयंती) के आसपास इस ऐतिहासिक सियासी पुनर्मिलन की औपचारिक घोषणा की जा सकती है।

बादल परिवार के गढ़ बठिंडा में बनेगी रणनीति, PM मोदी की रैली से घोषणा की तैयारी

इस सियासी गठबंधन को बड़े स्तर पर पेश करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बठिंडा में एक विशाल जनसभा आयोजित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। बादल परिवार का पारंपरिक राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले बठिंडा से ही प्रधानमंत्री और दोनों दलों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में इस गठबंधन का आधिकारिक ऐलान संभावित है। इस मंच से दोनों दल राज्य की जनता को एकजुटता का संदेश देकर 2027 के चुनावी समर में ताल ठोकने की तैयारी में हैं।

सीटों का नया समीकरण: ‘बड़ा भाई’ बनने की दिशा में भाजपा, मांग सकती है 47 से 48 सीटें

पंजाब की 117 सदस्यीय विधानसभा के लिए इस बार सीटों के बंटवारे का फॉर्मूला पुराने दौर से काफी अलग रहने वाला है। 2017 तक अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहते हुए 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा के खाते में सिर्फ 23 सीटें आती थीं। हालांकि, बदले हुए सियासी माहौल में भाजपा राज्य में अपनी गहरी पैठ बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी इस बार लगभग बराबरी की हिस्सेदारी चाहती है और 47 से 48 सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर रही है, जबकि शेष सीटों पर अकाली दल अपने उम्मीदवार उतारेगा।

अमित शाह के दावे और सुखबीर बादल के बयानों से मिले थे मजबूत संकेत

इस नए सियासी समीकरण की सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव के बाद एनडीए की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने का दावा किया था। इसके तुरंत बाद अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी पंजाब के राज्यपाल से मुलाकात के उपरांत साफ किया था कि उनकी पार्टी समान विचारधारा और जनहित के मुद्दों पर साथ चलने वाले दलों के साथ गठबंधन को तैयार है। सुखबीर बादल ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को राज्य का सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधी बताते हुए उनके साथ किसी भी तरह के समझौते को सिरे से खारिज किया था और पूर्ववर्ती शिअद-भाजपा शासन को राज्य के अमन, चैन और सर्वांगीण विकास का स्वर्णिम दौर बताया था।

23 साल पुराना रहा है साथ, तीन बार मिलकर बना चुके हैं सरकार

पंजाब की राजनीति में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठजोड़ करीब ढाई दशक तक बेहद मजबूत और असरदार रहा है। दोनों दलों ने पहली बार 1997 में साथ मिलकर प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी। इसके बाद 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी इस गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की। 2012 में लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कर इस गठबंधन ने पंजाब के चुनावी इतिहास में नया रिकॉर्ड कायम किया था।

  • 1997 के चुनाव में अकाली दल ने 75 और भाजपा ने 18 सीटें जीतकर कुल 93 सीटों के साथ सरकार बनाई थी।

  • 2007 में अकाली दल को 49 और भाजपा को 19 सीटें मिलीं, जिससे गठबंधन 68 सीटों के आंकड़े पर पहुंचा।

  • 2012 में अकाली दल ने 56 और भाजपा ने 12 सीटें हासिल कर पुनः 68 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की।

कृषि कानूनों के विरोध में 2020 में टूटी थी राहें, अलग होकर दोनों को हुआ नुकसान

सितंबर 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में उठे किसान आंदोलन के चलते दोनों पुराने सहयोगियों की राहें जुदा हो गई थीं। उस वक्त विरोध दर्ज कराते हुए केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था और शिअद एनडीए से बाहर हो गया था। अलग होकर चुनाव लड़ने का नुकसान दोनों दलों को उठाना पड़ा। 2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल सिमटकर केवल 3 सीटों पर आ गया, जबकि भाजपा को 2 सीटें मिलीं। वहीं 2024 के आम चुनाव में भाजपा पंजाब में खाता भी नहीं खोल सकी और अकाली दल के खाते में केवल एक लोकसभा सीट आई। ऐसे में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए दोनों दल एक बार फिर पुराना विश्वास बहाल कर राज्य की सत्ता में लौटने की कवायद में जुट गए हैं।

 

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