
आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता की हैट्रिक लगाने का सपना संजोए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक-एक वोट सहेजने के लिए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान में पूरी ताकत झोंक रही है। पार्टी नेतृत्व और संगठन का स्पष्ट निर्देश है कि हर बूथ पर कार्यकर्ता सक्रिय रहें, पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाएं और मतदाता सूची की खामियां दुरुस्त करें। हालांकि, जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। संगठन जहां बूथ को मजबूत करने में जुटा है, वहीं बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों की प्राथमिकता अब एसआईआर नहीं, बल्कि अपनी विधायकी और टिकट बचाना हो गई है। टिकट कटने की तेज होती अटकलों ने कई विधायकों की रातों की नींद उड़ा दी है।
टिकट कटने की सुगबुगाहट से विधायकों में भारी बेचैनी
भाजपा संगठन के भीतर मौजूदा विधायकों के रिपोर्ट कार्ड, जनता के बीच उनकी छवि, स्थानीय कार्यकर्ताओं से तालमेल और संभावित एंटी-इंकंबेंसी (सत्तारूढ़ विरोधी लहर) का गहन आकलन शुरू हो चुका है। टिकट वितरण में इस बार जातीय संतुलन और स्थानीय संगठन की गोपनीय रिपोर्ट को सबसे अहम माना जा रहा है। जिन विधायकों को अपनी जमीनी पकड़ कमजोर होने का डर सता रहा है, वे अब क्षेत्र के मतदाताओं को जोड़ने के बजाय समर्थकों की गोलबंदी और शीर्ष नेतृत्व के दरबार में हाजिरी लगाने में व्यस्त हैं। अपनी उपलब्धियों का पुलिंदा तैयार कर संगठन के प्रभावशाली नेताओं तक पैठ बनाना ही अब उनकी मुख्य रणनीति बन चुका है।
बूथ प्रबंधन और SIR अभियान की रफ्तार पर संकट
पार्टी पदाधिकारी जहां दिन-रात एक कर बूथ स्तर पर नए नाम जुड़वाने और मतदाताओं को जागरूक करने की कवायद में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर विधायक अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए दिल्ली से लेकर लखनऊ तक शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। विधायकों के इस बदले रुख से पार्टी के इस महत्वपूर्ण अभियान की गति धीमी पड़ने लगी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जनप्रतिनिधियों का ध्यान बूथ प्रबंधन से हटा रहा, तो इसका सीधा असर मतदाता सूची पर पड़ सकता है और भाजपा समर्थक मतदाताओं के नाम छूटने या कटने का बड़ा सियासी नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
भाजपा शीर्ष नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती
चुनावी समर से ठीक पहले भाजपा आलाकमान के सामने अब दोहरा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ संगठन को बूथ स्तर तक एसआईआर प्रक्रिया को पारदर्शी व मजबूत बनाना है, तो दूसरी तरफ टिकट कटने के खौफ से विधायकों में पनप रही नाराजगी और असहजता को थामना है। व्यक्तिगत दावेदारियों की इस खींचतान और संगठन की सामूहिक प्राथमिकताओं के बीच सही संतुलन साधना ही तय करेगा कि चुनावी मैदान में भाजपा का किला कितना अभेद्य रह पाता है।
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