Saturday , 17 October 2026

नीले ड्रम में पति की लाश और सीमेंट: सौरभ हत्याकांड के 163 पन्नों के फैसले में कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, बताया समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाला अपराध

बहुचर्चित नीले ड्रम वाले सौरभ हत्याकांड में अदालत ने दोषियों के कृत्य को न केवल जघन्य बल्कि मानवीय संवेदनाओं को तार-तार करने वाला करार दिया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने अपने 163 पन्नों के विस्तृत फैसले में बेहद गंभीर और तीखी टिप्पणियां दर्ज की हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि एक विवाहिता द्वारा अपने गैर-मर्द साथी के साथ मिलकर पति को इस तरह साजिश के तहत मार डालना सिर्फ एक इंसान का विश्वास तोड़ना नहीं है, बल्कि यह पूरे सामाजिक ताने-बाने और भरोसे की बुनियाद को ध्वस्त कर देने जैसा घिनौना कृत्य है।

विदेश से लौटे पति का कत्ल और सीमेंट में दफन करने की रूह कंपाने वाली साजिश

न्यायालय ने फैसले में घटना की वीभत्सता को रेखांकित करते हुए लिखा कि सौरभ विदेश से अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिताने के अरमान लेकर वतन लौटा था। ऐसे पति को उसकी ही अर्धांगिनी द्वारा पूरी योजना बनाकर पहले बेहोश करना, फिर बेरहमी से टुकड़ों में काटना और ड्रम के भीतर सीमेंट डालकर दफना देना शैतानी और घिनौनी मानसिकता की पराकाष्ठा है। घटनास्थल के कमरे की दीवारों और छतों पर लगे खून के धब्बे चीख-चीख कर उस खौफनाक मंजर और हैवानियत की गवाही दे रहे थे। शव को ठिकाने लगाने का यह शातिराना तरीका सीधे तौर पर समाज की अंतरात्मा को हिला देने वाला है।

न औलाद से मोह, न चेहरे पर पछतावा: सुधार की गुंजाइश शून्य

मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों आरोपियों के हाव-भाव और बर्ताव पर भी गहरी नजर रखी। फैसले में उल्लेख किया गया कि पूरे ट्रायल के दौरान दोनों दोषियों में रत्ती भर भी पश्चाताप या अपराध-बोध नहीं दिखा। दोषी साहिल ने अपने पिता से मिलने में कोई रुचि नहीं दिखाई, वहीं महिला दोषी मुस्कान ने अपनी पहली संतान की सुध तक नहीं ली। अदालत ने स्पष्ट माना कि डेढ़ वर्ष की जेल अवधि के दौरान ऐसा अवांछनीय और बेपरवाह रवैया यह साबित करता है कि इनमें सुधार या सामाजिक पुनर्वास की कोई उम्मीद नहीं बची है। ऐसे अपराधी समाज और अपनी संतानों के लिए आजीवन एक गंभीर खतरा हैं, इसलिए नरमी बरतने की कोई गुंजाइश नहीं बनती।

‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ श्रेणी और 6 ऐतिहासिक नजीरों से कसा शिकंजा

अदालत ने बिना किसी झिझक के इस पूरे घटनाक्रम को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामलों की कसौटी पर खरा पाया और अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए देश के कई ऐतिहासिक न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया:

  • मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): अदालत ने सौरभ हत्याकांड की जघन्यता की तुलना मच्छी सिंह केस से करते हुए रेयरेस्ट ऑफ रेयर सिद्धांत के कड़े मानकों को लागू किया।

  • राम सिंह बनाम सोहिनया (2007): जब परिवार के ही किसी सदस्य की नींद में बिना किसी उकसावे के सुनियोजित हत्या कर दी जाए, तो यह साफ होता है कि मुजरिमों के भीतर बुनियादी इंसानियत खत्म हो चुकी है।

  • एडक्कंडी दिनेशन बनाम केरल राज्य: गवाहों के बयानों में यदि आंतरिक सच्चाई झलकती है, तो महज तकनीकी पुष्टि के अभाव में उनकी गवाही को नकारा नहीं जा सकता।

  • सोहराब बनाम मप्र (1973) एवं यूपी राज्य बनाम एम.के. एंथनी (1985): अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटी-मोटी चूकों या मामूली विरोधाभासों से केस खारिज नहीं होता; अदालत का असली दायित्व भूसे से अनाज अलग करने की तरह सच तक पहुंचना है।

  • किरेन्दर सरकार बनाम असम राज्य (2009): आम नागरिक अक्सर कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचना चाहते हैं, लिहाजा बाहरी या स्वतंत्र गवाह न मिलने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं पड़ता। इसके साथ ही एफआईआर कोई विस्तृत विश्वकोश नहीं होती कि उसमें हर बारीक विवरण दर्ज हो।

  • आफताब अहमद अंसारी बनाम उत्तरांचल राज्य (2010): परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मुकदमों में यदि आरोपी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत सच को पूरी तरह झुठलाता है, तो उसका यह झूठ उसके खिलाफ दोष की एक और अकाट्य कड़ी बन जाता है।

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