Wednesday , 9 September 2026

BRICS Summit in India: 11 सितंबर को भारत आएंगे व्लादिमीर पुतिन, पीएम मोदी संग महा-मुलाकात से उड़ी पश्चिमी देशों की नींद; क्या ढह जाएगी डॉलर की बादशाहत?

भारत की मेजबानी में आयोजित होने जा रहे 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को लेकर पूरी दुनिया में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। वैश्विक मंच पर दशकों से चले आ रहे असंतुलित शक्ति-तंत्र और अमेरिकी वर्चस्व के सामने यह सम्मेलन एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या वाशिंगटन का एकाधिकार और डॉलर का दबदबा अब समाप्ति की कगार पर है? इस भूचाल की सबसे बड़ी वजह रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा है। पुतिन 11 सितंबर को नई दिल्ली पहुंच रहे हैं, जहां ब्रिक्स समिट से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बेहद अहम और रणनीतिक द्विपक्षीय वार्ता होने जा रही है। इस बैठक की भनक मात्र से ही पश्चिमी ताकतों और व्हाइट हाउस के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।

व्हाइट हाउस नहीं, अब विकासशील ताकतें तय करेंगी दुनिया की दिशा

दशकों से जिस वैश्विक अर्थव्यवस्था को पश्चिमी देशों ने डॉलर की जंजीरों में जकड़ रखा था, अब उसी प्रभुत्व को नई दिल्ली के कूटनीतिक मंच से खुला संदेश मिलने जा रहा है। 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले मोदी-पुतिन की यह निजी बैठक वैश्विक शक्ति-संतुलन को बदलने वाली साबित हो सकती है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस महा-मुलाकात की पुष्टि करते हुए कहा है कि दोनों नेताओं के बीच बेहद व्यावहारिक, स्पष्ट और भरोसेमंद संबंध हैं, जिससे वैश्विक एजेंडे और दोनों देशों से जुड़े संवेदनशील मसलों पर खुलकर चर्चा संभव होगी। रूस यह साफ कर चुका है कि भारत उसके लिए दुनिया का सबसे अहम और रणनीतिक साझेदार है।

यूक्रेन युद्ध से लेकर डिफेंस और न्यूक्लियर सेक्टर में गेमचेंजर डील की उम्मीद

रूस और यूक्रेन के बीच जारी सैन्य टकराव के साथ-साथ पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर दोनों नेताओं के बीच गहन विचार-विमर्श तय है। दुनिया भली-भांति जानती है कि युद्ध की दिशा मोड़ने और शांति का रास्ता निकालने में भारत की भूमिका कितनी निर्णायक है। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच नए इकोनॉमिक कॉरिडोर, व्यापार विस्तार, रक्षा सौदों और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में किसी ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लग सकती है। पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता आया है, और यह बैठक रक्षा साझेदारी को एक नई ऊंचाई देने जा रही है।

डॉलर के सिस्टम पर कड़ा वार: 96% द्विपक्षीय व्यापार अब रुपया-रूबल में

इस महा-मुलाकात से अमेरिका की बेचैनी का सबसे बड़ा कारण आर्थिक मोर्चा है। क्रेमलिन के मुताबिक, रूस और ब्रिक्स देशों के बीच करीब 90 फीसदी भुगतान अब स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। वहीं भारत और रूस के बीच 96 फीसदी व्यापार डॉलर को दरकिनार कर सीधे रुपये और रूबल में संपन्न हो रहा है। जुलाई 2026 तक भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50.83 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जबकि दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 70 अरब डॉलर के सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर को छू चुका है। दिल्ली में होने वाले सम्मेलन में नेशनल करेंसी और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को औपचारिक मंजूरी मिलने से डॉलर के एकाधिकार को तगड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है।

40% वैश्विक जीडीपी और आधी आबादी की आवाज बना ब्रिक्स

यह सम्मेलन इसलिए भी अलग है क्योंकि 2024 में शुरू हुई पार्टनर देशों की नई श्रेणी अब पूरी तरह आकार ले चुकी है। बेलारूस, बोलीविया, वियतनाम, कजाकिस्तान, क्यूबा, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान जैसे देशों को अलग-अलग वर्किंग ग्रुप्स में जोड़ा जा रहा है। दुनिया की 49.5% आबादी और 40% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करने वाला ब्रिक्स अब केवल एक मंच नहीं, बल्कि 20वीं सदी के पश्चिमी सिस्टम को बदलने वाला पावर ब्लॉक बन चुका है। ब्रिक्स में चीन की मौजूदगी के बावजूद रूस जिस तरह भारत के साथ अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देता है, वह क्षेत्र में संतुलन साधने के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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