
काठमांडू/नई दिल्ली नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर फटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने मध्य नेपाल में भारी तबाही मचाई है। आपदा प्रभावित आठ जिलों से अब तक 768 शव निकाले जा चुके हैं, जबकि 2,500 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। रुक-रुक कर हो रही मूसलाधार बारिश और तिब्बत में नदी उद्गम स्थल के पास नई अस्थायी झील बनने से भोटेकोशी का जलस्तर फिर बढ़ने लगा है, जिसके चलते निचले इलाकों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। नेपाल की इस त्रासदी ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक ‘वाटर बमों’ को लेकर भी खतरे की बड़ी घंटी बजा दी है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. भूपेंद्र मिली के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 नदी घाटियों में मौजूद 28,000 ग्लेशियर झीलों में से करीब 7,500 भारत में स्थित हैं। अकेले गंगा बेसिन में इनकी संख्या 4,700 से अधिक है। एनडीएमए ने इनमें से 195 से 200 झीलों को ‘ए-श्रेणी’ यानी अति-संवेदनशील व उच्च जोखिम वाले दायरे में रखा है। यदि समय रहते इनका उचित प्रबंधन नहीं हुआ, तो पहाड़ों के साथ-साथ उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के मैदानी इलाकों में भी अभूतपूर्व जलप्रलय आ सकता है।
नेपाल में भीषण तबाही की मुख्य वजहें
नेपाल और तिब्बत के पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियों को दरकिनार कर अनियंत्रित और अवैज्ञानिक निर्माण कार्य किए गए। इसके अलावा, नदियों के प्राकृतिक जलभराव और बहाव क्षेत्र में बस्तियां बसने तथा अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) के समय पर सक्रिय न होने से पानी व मलबे को निकलने का रास्ता नहीं मिला, जिससे जान-माल का नुकसान कई गुना बढ़ गया।
भारत में हिमालयी झीलों से कितना बड़ा खतरा?
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में चिह्नित 195 से 200 उच्च जोखिम वाली झीलें प्राकृतिक ‘वाटर बम’ के समान हैं। अत्यधिक बारिश, बादल फटने या भूस्खलन की स्थिति में यहां अचानक ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) आने का गंभीर खतरा बना रहता है। यह स्थिति पहाड़ों में भारी कटाव और निचले इलाकों में अचानक भीषण बाढ़ ला सकती है।
खतरे की जद में देश के कौन-कौन से राज्य और क्षेत्र?
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पहाड़ी राज्य: हिमाचल प्रदेश की 48, सिक्किम की 40, लद्दाख की 35, अरुणाचल प्रदेश की 28, जम्मू एवं कश्मीर की 26 और उत्तराखंड की 13 झीलें उच्च जोखिम श्रेणी में शामिल हैं।
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मैदानी इलाके: नेपाल या सिक्किम में झीलों के फटने से कोसी, गंडक और तीस्ता जैसी उफनती नदियों के जरिए उत्तर बिहार के सुपौल, सहरसा, मधुबनी व चंपारण तथा उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग तराई क्षेत्र में लाखों क्यूसेक पानी व गाद आने से तटबंध टूटने और भारी जलभराव का खतरा रहता है।
आपदा से बचाव और सुरक्षा के लिए किए जा रहे उपाय
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हैजार्ड जोनिंग मैपिंग: सभी 200 संवेदनशील झीलों के संभावित खतरे के दायरे का नक्शा तैयार किया जा रहा है, ताकि असुरक्षित व ढलान वाले क्षेत्रों में नए निर्माण और बस्तियों को रोका जा सके।
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इंजीनियरिंग रोकथाम तकनीक: झीलों के मुहाने पर अतिरिक्त पानी निकालने के लिए ड्रेनेज सिस्टम, चेक डैम और पानी के बहाव को मोड़ने के लिए डिफ्लेक्शन स्ट्रक्चर विकसित किए जा रहे हैं।
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सेंसर व सैटेलाइट नेटवर्क: सैटेलाइट के जरिए 24 घंटे निगरानी के साथ-साथ अगले दो वर्षों में सभी उच्च जोखिम वाली झीलों पर ऑटोमैटिक अर्ली वार्निंग सेंसर स्थापित करने की योजना पर तेजी से काम चल रहा है।
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