
आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मान्यम (Parvathipuram Manyam) जिले के एक सुदूर और दुर्गम आदिवासी इलाके से इंसानियत को गौरवान्वित करने वाली एक ऐसी अद्भुत तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया है। यहां के एक ट्राइबल वेलफेयर आश्रम स्कूल की महिला वार्डन ने अपनी जान की परवाह न करते हुए फर्ज और इंसानियत की एक बेमिसाल कहानी लिखी है। स्कूल की वार्डन हेमा ने तेज बुखार से तड़प रही एक 11 साल की मासूम छात्रा की जान बचाने के लिए उसे अपनी पीठ पर लादा और करीब 6 किलोमीटर लंबे पथरीले, पहाड़ी और घने जंगली रास्ते को पैदल ही पार कर अस्पताल पहुंचाया।
जब एंबुलेंस नहीं पहुंची, तो खुद ‘मसीहा’ बन गई वार्डन हेमा
दिल को झकझोर देने वाली यह घटना 30 जून की बताई जा रही है। आश्रम स्कूल में पढ़ने वाली एक 11 वर्षीय आदिवासी छात्रा को अचानक बेहद तेज बुखार आ गया और उसकी हालत बिगड़ने लगी। चूंकि यह इलाका बेहद पिछड़ा और पहाड़ों से घिरा हुआ है, इसलिए गांव तक न तो पक्की सड़क थी और न ही कोई गाड़ी या एंबुलेंस पहुंचने का साधन था। ऊपर से मानसून की बारिश के कारण रास्ते बेहद फिसलन भरे और खतरनाक हो चुके थे। ऐसे में समय रहते इलाज न मिलने पर बच्ची की जान को खतरा हो सकता था। हालात की गंभीरता को देखते हुए वार्डन हेमा ने बिना एक पल गंवाए बच्ची को अपनी पीठ पर बांधा और दुर्गम रास्तों पर पैदल ही सफर शुरू कर दिया। वे बच्ची को सुरक्षित संभालते हुए समय पर नजदीकी मेडिकल सेंटर ले आईं, जहां इलाज के बाद बच्ची अब पूरी तरह सुरक्षित है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो, राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने की तारीफ
इस हैरतअंगेज और भावुक कर देने वाले सफर का एक वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। आंध्र प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. शैलजा रायापति ने खुद इस वीडियो को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया है। वीडियो के सामने आते ही इंटरनेट यूजर्स भावुक हो गए और हर कोई वार्डन हेमा की बहादुरी को सलाम कर रहा है। लोगों ने उन्हें ‘रियल हीरो’ और ‘धरती पर भगवान का रूप’ करार दिया है। एक यूजर ने लिखा, “ऐसे ही लोग आज के दौर में इंसानियत को जिंदा रखे हुए हैं,” जबकि दूसरे यूजर ने मांग की कि “सरकार को ऐसी कर्मठ और जांबाज महिला को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करना चाहिए।”
बहादुरी के पीछे छिपी सिस्टम की लाचारी, बुनियादी सुविधाओं पर उठे सवाल
यह घटना जहां एक तरफ सरकारी कर्मचारियों की रूटीन ड्यूटी से कहीं आगे जाकर उनके समर्पण को दर्शाती है, वहीं दूसरी तरफ देश के दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में आज भी बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की बदहाली को भी उजागर करती है। स्वास्थ्य सेवाओं, पक्की सड़कों और आपातकालीन परिवहन की भारी कमी के कारण आज भी इन इलाकों के लोगों को इलाज के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। डॉ. शैलजा रायापति ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा कि जब जिम्मेदारी और इंसानियत एक साथ मिलते हैं, तो किसी भी अनमोल जिंदगी को बचाया जा सकता है। यह वीडियो न केवल वार्डन हेमा की बहादुरी का दस्तावेज है, बल्कि नीति-निर्माताओं को यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि देश के सुदूर आंचलों में अभी विकास की पहुंच कितनी बाकी है।
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