लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती मामले को लेकर राजधानी लखनऊ की सड़कें एक बार फिर आंदोलन की आग में सुलग उठी हैं। सुप्रीम कोर्ट में कल यानी 19 मई को होने वाली बेहद अहम सुनवाई से ठीक पहले, सोमवार को आरक्षित वर्ग (OBC और SC) के अभ्यर्थियों ने अपनी मांगों को लेकर लखनऊ में एक विशाल और आक्रामक प्रदर्शन किया। इस दौरान भारी संख्या में उम्मीदवार बेसिक शिक्षा मंत्री के सरकारी आवास का घेराव करने पहुंचे और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप की परवाह किए बिना अपनी मांगों पर अड़े अभ्यर्थी सड़क पर रेंगते हुए विरोध प्रदर्शन करते नजर आए। हालात को काबू में करने के लिए मौके पर मौजूद भारी पुलिस बल ने अभ्यर्थियों को जबरन हिरासत में लेकर वहां से हटाने की कोशिश की, जिससे काफी देर तक अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।
“कल सुप्रीम कोर्ट में 31वीं तारीख, लेकिन सरकार नहीं कर रही पैरवी” – अभ्यर्थियों का छलका दर्द
प्रदर्शन कर रहे आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि सुप्रीम कोर्ट में उनके भविष्य का फैसला अटका हुआ है और सरकार इस पर उदासीन बनी हुई है। आंदोलनकारी उम्मीदवारों का साफ कहना है, “कल 19 मई को देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में हमारी याचिका पर सुनवाई की तारीख लगी है। इस पूरे मामले में यह हमारी 31वीं तारीख है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग की तरफ से कोर्ट में हमारे पक्ष में कहीं कोई ठोस पैरवी नहीं की जा रही है।”
उम्मीदवारों ने बेहद भावुक और आक्रोशित लहजे में मांग की कि सरकार कम से कम कल होने वाली सुनवाई में सही और मजबूत तरीके से वकीलों को खड़ा करे, ताकि उनके आरक्षण से जुड़े मूल मुद्दों को अदालत के सामने सही परिप्रेक्ष्य में उठाया जा सके।
आरक्षण नियमों में भारी धांधली का आरोप: ओबीसी को 27% की जगह मिला महज 3.68%
इस शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शुरुआत से ही आरक्षण के नियमों को लेकर गंभीर विसंगतियों के आरोप लगते रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों का दावा है कि इस पूरी भर्ती में पिछड़ों और दलितों के हक पर डाका डाला गया है। उनका गणितीय आरोप है कि नियमों के मुताबिक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण की जगह इस सूची में महज 3.68 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है।
ठीक इसी तरह, अनुसूचित जाति (SC) वर्ग को मिलने वाले कानूनी 21 फीसदी कोटे की जगह केवल 16.2 प्रतिशत आरक्षण ही आवंटित किया गया है। दूसरी तरफ, इन गंभीर आरोपों पर जब बेसिक शिक्षा विभाग (Basic Education Department) के अधिकारियों से बात की गई, तो उनका केवल एक ही रटा-रटाया जवाब सामने आया कि यह पूरा मामला फिलहाल माननीय न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए वे इस पर कुछ नहीं कह सकते।
क्या है पूरा कानूनी मामला? सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं हजारों निगाहें
उत्तर प्रदेश का यह 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती मामला लंबे समय से कानूनी दांव-पेच में उलझा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वाद सूची के अनुसार, इस संवेदनशील मामले की सुनवाई कल 19 मई, 2026 को निर्धारित है। शीर्ष अदालत में इस मामले की सुनवाई माननीय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की संयुक्त पीठ (डिविजन बेंच) करने जा रही है।
गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी, जिसमें हाई कोर्ट ने पूर्व में जारी पूरी मेरिट लिस्ट को ही रद्द करने और राज्य सरकार को 3 महीने के भीतर नए सिरे से पूरी चयन सूची (रिवाइज्ड लिस्ट) तैयार करने का सख्त आदेश दिया था।
साल 2018 से जारी है हक की लड़ाई, विपक्ष ने सरकार को घेरा
यह पहला मौका नहीं है जब लखनऊ की सड़कों पर इन भावी शिक्षकों पर लाठियां चली हों या इन्होंने इस तरह का उग्र प्रदर्शन किया हो। वास्तव में, यह पूरा विवाद और अभ्यर्थियों का यह सत्याग्रह साल 2018 से अनवरत रूप से चल रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर अब उत्तर प्रदेश की सियासत भी पूरी तरह गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस मुद्दे को लपकते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की योगी सरकार पर तीखा हमला बोला है।
समाजवादी पार्टी ने आधिकारिक तौर पर आरोप लगाया है कि 69,000 शिक्षक भर्ती प्रक्रिया के आरक्षण और नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार हुआ है। सरकार ने जानबूझकर दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया है। सपा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि शिक्षक अभ्यर्थियों का यह आरोप शत-प्रतिशत सही है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की कमजोर और लचर पैरवी के कारण ही इस मामले की मुकम्मल सुनवाई नहीं हो पा रही है। सितंबर 2024 के बाद से इस केस में केवल तारीखें आगे बढ़ाई जा रही हैं और सुनवाई को बार-बार स्थगित किया जा रहा है, जिससे हजारों युवाओं का भविष्य अधर में लटका है।
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