Friday , 28 August 2026

‘समुद्र मंथन’ से निकलेगा तेल-गैस का खजाना: गहरे समंदर में उतरने की तैयारी , कैबिनेट ने मंजूर किया ₹84,084 करोड़ का मेगा प्लान

भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। समुद्र की अथाह गहराइयों में छिपे विशाल तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों को खोजने के लिए सरकार ने चरणबद्ध रोडमैप तैयार किया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ‘समुद्र मंथन’ यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम (National Offshore Exploration Scheme) नाम दिया गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत संचालित होने वाली इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना का मुख्य लक्ष्य समुद्र तल के नीचे दबे लगभग 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (करीब 60 करोड़ टन कच्चे तेल के बराबर) ऊर्जा भंडार का दोहन करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 31 जुलाई 2026 को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में योजना को मंजूरी दी गई, जिसके पहले चरण के तहत वित्त वर्ष 2030-31 तक 84,084 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया जाएगा।

13 लाख करोड़ का तेल आयात बिल बना बड़ी चुनौती भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता देश है। घरेलू मांग पूरी करने के लिए देश को सालाना लगभग 144 अरब डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) का विशाल आयात बिल चुकाना पड़ता है। बीते एक दशक में भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा, देश की लगभग आधी प्राकृतिक गैस जरूरतें भी विदेशी आयात के भरोसे ही पूरी हो रही हैं। ऐसे में समुद्र मंथन योजना विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने और घरेलू उत्पादन को गति देने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

गहरे समंदर में 5,600 MMT का छिपा खजाना भूवैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, भारत के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिन 3,000 मीटर तक की अत्यधिक गहराई तक फैले हुए हैं। इन गहरे समुद्री क्षेत्रों में 5,600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से भी अधिक हाइड्रोकार्बन क्षमता मौजूद होने का अनुमान है। हालांकि, गहरे पानी में ड्रिलिंग (Deepwater Drilling) तकनीकी रूप से बेहद जटिल, महंगी और जोखिम भरी मानी जाती है। गहरे समुद्र में एक अकेले कुएं की ड्रिलिंग पर ही 125 से 150 मिलियन डॉलर का भारी खर्च आता है और एक्सप्लोरेशन ब्लॉक आवंटन से लेकर वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने में 5 से 10 साल तक का लंबा समय लग जाता है।

वित्तीय जोखिम बांटेगी सरकार, निजी कंपनियों को मिलेगा संबल भारी लागत और वित्तीय अनिश्चितता के कारण अब तक सरकारी और निजी क्षेत्र की तेल कंपनियां गहरे समुद्र में बड़े पैमाने पर उतरने से हिचकती रही हैं। कंपनियों की इसी हिचकिचाहट को दूर करने और निवेश का माहौल तैयार करने के लिए समुद्र मंथन योजना में रिस्क-शेयरिंग मॉडल लागू किया गया है। इसके तहत सरकार वित्तीय और तकनीकी जोखिमों को कंपनियों के साथ साझा करेगी, जिससे डीप-सी एक्सप्लोरेशन को नई रफ्तार मिलेगी और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ा सकेगा।

 

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