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नेपाल में तबाही का सैलाब: क्या चीन की चुप्पी से आई प्रलय? 45 मिनट की देरी ने बढ़ाई टेंशन, बिहार पर भी मंडराया खतरा

काठमांडू/नई दिल्ली। साल 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद नेपाल ने एक बार फिर प्रकृति का सबसे खौफनाक मंजर देखा है। रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के उफान और अचानक आई भीषण बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने भारी तबाही मचाई है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार देश के इतिहास में जल प्रलय का ऐसा रूप पहले कभी दर्ज नहीं किया गया। बिना किसी पूर्व चेतावनी के आए इस सैलाब ने जनजीवन को तहस-नहस कर दिया है। अब इस भीषण त्रासदी के कारणों की पड़ताल के बीच नेपाल और चीन के रिश्ते भी कूटनीतिक तनाव के मुहाने पर खड़े नजर आ रहे हैं।

चीन की चेतावनी में 45 मिनट की देरी बनी काल बाढ़ का मूल स्रोत तिब्बत के ऊपरी इलाके से जुड़ा बताया जा रहा है। नेपाली सूत्रों का दावा है कि तिब्बत के केरुंग क्षेत्र से आए इस जलजले की चेतावनी नेपाल के पास 45 मिनट की देरी से पहुंची। चीनी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत में स्थानीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे बाढ़ की स्थिति बन चुकी थी। नेपाल की सीमा वहां से मात्र 25 से 30 किलोमीटर दूर है और दोनों देशों की घड़ियों में करीब सवा दो घंटे का फर्क है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आधुनिक तकनीक और सैटेलाइट सिस्टम से लैस चीन ने नेपाल को रियल-टाइम डेटा तुरंत क्यों नहीं भेजा। यदि समय रहते पूर्व चेतावनी मिल जाती, तो निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त वक्त मिल सकता था।

डैम और सेफ्टी वॉल पर उठे सवाल, चीन का इनकार इस जलप्रलय के बाद नेपाल की ओर से यह आशंका जताई गई कि चीनी क्षेत्र में बने जियोलॉजिकल डिजास्टर डैम के टूटने से यह विनाशकारी बाढ़ आई। हालांकि, चीनी दूतावास ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें भ्रामक बताया है। चीन का कहना है कि नेपाली हिस्से में भूकंपीय हलचल के चलते कीचड़ और मलबे का बहाव तेज हुआ। वहीं दूसरी ओर, नदी इंजीनियरिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं। अप्रैल के महीने में नेपाल ने चीन से भोटेकोशी नदी के किनारे बन रही सेफ्टी वॉल का निर्माण रोकने की अपील की थी, ताकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो। विशेषज्ञों का मानना है कि किनारे पर बने कंक्रीट ढांचे पानी और मलबे के दबाव को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देते हैं।

चीन का इंफ्रास्ट्रक्चर भी ध्वस्त, कुदरत के आगे बेबस विकास इस आपदा की जद में केवल नेपाल ही नहीं आया, बल्कि चीनी सीमा के भीतर स्थित ग्यिरोंग क्षेत्र और वहां का बुनियादी ढांचा भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रकृति के असंतुलन के आगे विशालकाय निर्माण भी टिक नहीं पा रहे हैं। तिब्बत में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, भूस्खलन और हिमनद झीलों के फटने (GLOF) जैसी घटनाएं भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत दे रही हैं।

बिहार तक मंडरा रहा है जलप्रलय का खतरा भोटेकोशी नदी का यह तेज बहाव आगे चलकर त्रिशूली और नारायणी (गंडक) नदी के रास्ते भारत के बिहार राज्य में प्रवेश करता है। तिब्बत के पठार पर बन रहे बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट और अनियंत्रित निर्माण कार्य भारत और नेपाल जैसे निचले (डाउनस्ट्रीम) देशों के लिए लगातार रणनीतिक और पर्यावरणीय संकट पैदा कर रहे हैं। यदि भविष्य में ग्लेशियर टूटने और इंफ्रास्ट्रक्चर फेलियर की घटनाएं इसी तरह दोहराई गईं, तो यह पूरा सीमावर्ती क्षेत्र और उत्तर भारत के मैदानी इलाके भीषण जल आपदा का शिकार बन सकते हैं।

 

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