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गोरखपुर की दुर्गा पूजा : एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी परंपरा…जानें पूरा इतिहास

गोरखपुर । गोरखपुर में दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का संगम है। यह उत्सव 125 से भी ज़्यादा सालों से मनाया जा रहा है, जिसकी शुरुआत एक छोटी सी पहल से हुई और आज यह शहर की एक भव्य पहचान बन चुकी है।

गोरखपुर में दुर्गा पूजा की शुरुआत 1896 में डॉ. योगेश्वर राय ने की थी। बाद में, 1928 में बंगाली समिति का गठन हुआ, जिसने इस परंपरा को स्थिरता दी। 1953 में दीवान बाजार स्थित दुर्गाबाड़ी की स्थापना हुई, जो आज भी दुर्गा पूजा का एक प्रमुख केंद्र है। धीरे-धीरे यह पूजा सिर्फ बंगाली समिति तक ही सीमित नहीं रही। 1970 के दशक में दीवान बाजार में पूजा की शुरुआत हुई, और रेलवे स्टेशन रोड पर विशाल प्रतिमाएं स्थापित होने लगीं, जिन्होंने इसे एक बड़े मेले का रूप दे दिया।

राघव-शक्ति मिलन: एक अनूठी परंपरा
1948 से गोरखपुर में राघव-शक्ति मिलन नामक एक अनोखी परंपरा चली आ रही है। दशहरे के दिन रामलीला की शोभायात्रा, बसंतपुर तिराहे पर दुर्गाबाड़ी की प्रतिमा से मिलती है। यह आयोजन भगवान राम और मां दुर्गा के मिलन का प्रतीक माना जाता है, जो देश के और किसी हिस्से में देखने को नहीं मिलता।

आधुनिकता और परंपरा का मेल
समय के साथ, गोरखपुर की दुर्गा पूजा ने भी आधुनिकता को अपनाया है। 1987 से यहां स्वचालित प्रतिमाएं बनाई जाने लगी हैं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। ये प्रतिमाएं परंपरा को एक नया और आकर्षक रूप देती हैं। आज भी, प्रतिमाएं बनाने के लिए कोलकाता से मूर्तिकार बुलाए जाते हैं, ताकि कला और आस्था की प्रामाणिकता बनी रहे। हालांकि, अब स्थानीय मूर्तिकार भी इस कला में अपनी पहचान बना रहे हैं। गोरखपुर की यह दुर्गा पूजा, शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है, जो हर साल और भी ज़्यादा भव्यता के साथ मनाई जाती है।

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