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संसद में महिला आरक्षण बिल पर क्यों बिगड़ा बहुमत का गणित, जानें अंदर की पूरी कहानी

नई दिल्ली। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक ऐसा ऐतिहासिक पल आया जिसने सबको चौंका दिया। जिस ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण बिल को लेकर देश भर में चर्चा थी, वह लोकसभा की दहलीज पर आकर अटक गया। अपनी अचूक रणनीति और संख्या बल के लिए जानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी इस बार सदन में जरूरी आंकड़ा नहीं जुटा पाई। यह मोदी सरकार के इतिहास में पहली बार हुआ है जब कोई इतना महत्वपूर्ण बिल दो-तिहाई बहुमत की कमी के कारण गिर गया। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर संसद के भीतर वो कौन सी परिस्थितियां बनीं, जिसने सरकार के दांव को उलटा कर दिया।

विशेष बहुमत का ‘जादुई आंकड़ा’ बना सबसे बड़ी चुनौती

संसद के गलियारों में चर्चा है कि सरकार ने इस बिल को पेश करने की तैयारी तो पूरी की थी, लेकिन संविधान संशोधन की जटिलता को भांपने में चूक हो गई। किसी भी साधारण बिल को सामान्य बहुमत से पास कराया जा सकता है, लेकिन महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मामलों के लिए संविधान में बदलाव की आवश्यकता होती है। इसके लिए सदन में मौजूद सदस्यों के ‘विशेष बहुमत’ यानी दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी। एनडीए के पास लोकसभा में सामान्य बहुमत तो है, लेकिन अकेले अपने दम पर वह दो-तिहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकती थी। ऐसे में विपक्षी दलों का समर्थन अनिवार्य था, जो अंततः नहीं मिल सका और बिल गिर गया।

परिसीमन और जनगणना की शर्त पर छिड़ा संग्राम

सरकार द्वारा पेश किए गए इस बिल में एक पेंच था, जिसने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया। बिल की शर्त के अनुसार, महिला आरक्षण तभी लागू हो पाता जब देश में अगली जनगणना और उसके बाद सीटों का ‘परिसीमन’ यानी नए सिरे से निर्धारण होता। विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों ने इसे सरकार की ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया। विपक्ष का तर्क था कि सरकार इस प्रक्रिया के जरिए आरक्षण को 2029 या उससे भी आगे टालना चाहती है। उनकी मांग थी कि आरक्षण को बिना किसी शर्त के तुरंत प्रभाव से लागू किया जाए।

कोटा के भीतर कोटा: जातीय और धार्मिक समीकरणों का टकराव

बिल के रास्ते में एक और बड़ा रोड़ा ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग रही। समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग उठाकर मोर्चा खोल दिया। वहीं, कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाते हुए 33% आरक्षण के भीतर ओबीसी (OBC) महिलाओं के लिए अलग कोटा तय करने और इसे जाति जनगणना से जोड़ने की मांग की। सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है और ओबीसी कोटे की मांग को भी स्वीकार नहीं किया गया। इसी गतिरोध ने बिल की संभावनाओं को पूरी तरह खत्म कर दिया।

दक्षिण बनाम उत्तर भारत का राजनीतिक नैरेटिव

संसद के भीतर इस बहस ने क्षेत्रीय अस्मिता का रूप भी ले लिया। दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर डीएमके जैसे दलों ने यह डर जताया कि अगर परिसीमन जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो दक्षिण भारत की सीटें कम हो सकती हैं। उनका आरोप है कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को इसकी सजा मिलेगी और उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाएगा। इस ‘दक्षिण बनाम उत्तर’ के नैरेटिव ने विपक्षी एकता को और मजबूत कर दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि महिला आरक्षण बिल पास होने से पहले ही धराशायी हो गया।

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