
लखनऊ ब्यूरो। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने में अब महज छह महीने का वक्त बचा है। सूबे की सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। संगठन के शीर्ष नेताओं के ताबड़तोड़ दौरे और मैराथन बैठकों का सिलसिला जारी है। हाल ही में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े की अगुवाई में हुई बैक-टू-बैक बैठकों के बाद जो इंटरनल ग्राउंड फीडबैक सामने आया है, उसने भगवा खेमे की पेशानी पर बल ला दिए हैं। आंतरिक रिपोर्ट बताती है कि सियासी पिच पर मुकाबला अब एकतरफा नहीं बल्कि कांटे की टक्कर में तब्दील हो चुका है।
धर्म की पिच पर जाति की गुगली, क्या बिगड़ेगा समीकरण? यूपी की राजनीति में हिंदुत्व हमेशा से भाजपा का सबसे मजबूत चुनावी दुर्ग रहा है, लेकिन बैठकों से छनकर आई खबरों के मुताबिक पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चिंता ‘जातीय राजनीति’ के उभार को लेकर है। सूत्रों का कहना है कि सियासी फिजां धीरे-धीरे धर्म से फिसलकर जातीय खांचों की तरफ मुड़ती दिख रही है। अगर चुनावी नैरेटिव पूरी तरह से जातियों के इर्द-गिर्द सिमट गया, तो यह स्थिति भाजपा के कोर वोट बैंक के लिहाज से एक बड़ा झटका साबित हो सकती है।
उपेक्षित कार्यकर्ता और 100 से ज्यादा विधायकों के खिलाफ बगावती सुर पार्टी की रीढ़ माने जाने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं का असंतोष भी आलाकमान के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। कई स्तरों से यह शिकायत दर्ज कराई गई है कि कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही और उन्हें वो तवज्जो नहीं मिल रही जिसके वे हकदार हैं। साल 2024 के आम चुनाव में भी यह टीस भारी पड़ी थी, जिसे पार्टी 2027 में किसी कीमत पर दोहराना नहीं चाहती। इसके अलावा आंतरिक सर्वे में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि करीब 100 से ज्यादा मौजूदा विधायकों के खिलाफ भयंकर सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) है। यानी पार्टी को विपक्ष से पहले अपनी ही चौखट पर उपजे गुस्से से निपटना होगा।
संगठन के नए चेहरों पर सवाल और बराबरी की जंग विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हाल ही में खड़ी की गई संगठन की नई टीम को लेकर भी पार्टी के भीतर कानाफूसी तेज है। जमीनी कार्यकर्ताओं में कुछ नए पदाधिकारियों की चयन प्रक्रिया और सिफारिशी एंट्री को लेकर नाराजगी है। नेतृत्व की कोशिश है कि बिना किसी फेरबदल के इसी टीम से काम लिया जाए क्योंकि अब नए प्रयोगों का समय हाथ से फिसल रहा है। सबसे बड़ा झटका यह है कि पार्टी खुद को इस बार ‘एकतरफा बढ़त’ में नहीं पा रही है। फीडबैक के अनुसार, जमीन पर फिलहाल ‘बराबरी का मुकाबला’ चल रहा है, जो सत्ताधारी दल के लिए एक खतरे की घंटी है। विपक्ष अगर अपने नैरेटिव को धार देने में कामयाब रहा, तो राह और भी पथरीली हो सकती है।
सोशल मीडिया का वार रूम और बेरोजगार युवाओं का गुस्सा चुनावी लड़ाई अब केवल जनसभाओं या बैनर-पोस्टर तक सीमित नहीं रही, बल्कि असली जंग मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जा रही है। सूत्रों की मानें तो सोशल मीडिया पर विपक्ष के बढ़ते दबदबे से निपटने के लिए भाजपा मीडिया टीम को ‘फुल अटैकिंग मोड’ में आने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि पहली बार वोट देने वाले युवा वोटर्स विपक्ष के पाले में न खिसकें। इसके साथ ही, युवा वर्ग और बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को जल्द कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के मसले पर सरकार अपनी उपलब्धियों को आक्रामक तरीके से सामने रखने की तैयारी में है।
बसपा का गिरता ग्राफ भाजपा के लिए क्यों बना सिरदर्द? मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में जारी अंदरूनी घमासान ने भी भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। चुनावी आंकड़े गवाह हैं कि जब-जब बसपा कमजोर पड़ती है, उसका सीधा सियासी फायदा भाजपा के बजाय सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिलता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक जिस तरह बिखरा, उसका बड़ा खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा था। ऐसे में दलित वोटों का बिखराव रोकना और उन्हें अपने पाले में बनाए रखना भाजपा के रणनीतिकारों के लिए एक पेचीदा पहेली बन गया है।
बीएल संतोष की मैराथन बैठकें और एकजुटता का कड़ा संदेश बीएल संतोष के तीन दिवसीय दौरे ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज कर दी है। ग्राउंड फीडबैक, विधायकों का रिपोर्ट कार्ड और बूथ स्तर की वास्तविक स्थिति का कच्चा-चिट्ठा अब केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा जाएगा, जिसके बाद बड़े रणनीतिक बदलावों की पटकथा लिखी जाएगी। बैठकों के समापन पर संगठन महामंत्री ने दो टूक शब्दों में संदेश दिया कि सभी को आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना होगा। संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल ही जीत की कुंजी बनेगा, क्योंकि 2027 का दंगल भाजपा के लिए केवल एक चुनावी जंग नहीं, बल्कि यूपी में अपनी सत्ता की हैट्रिक बचाने की साख का सवाल है।
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