Wednesday , 16 September 2026

UP Assembly Elections 2027: यूपी में चुनाव से पहले गठबंधन में सीटों पर रार! सपा कांग्रेस को देना चाहती है 60-70 सीटें, 105 पर अड़ी ‘हाथ’ की दावेदारी

लखनऊ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की रणभेरी बजने से पहले ही राजनीतिक दलों के भीतर सियासी बिसात बिछने लगी है। सूबे की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी को सीधी चुनौती देने की तैयारी कर रहे ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भीतर सीटों के तालमेल को लेकर खींचतान तेज हो गई है। सबसे ज्यादा सियासी हलचल समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच संभावित सीट बंटवारे को लेकर देखने को मिल रही है। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 60 से 70 सीटें देने के फॉर्मूले पर गंभीरता से मंथन कर रही है, जबकि कांग्रेस 2017 के गठबंधन का हवाला देते हुए करीब 105 सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रही है।

सपा की रणनीति: संख्या बल नहीं, जिताऊ चेहरा और जमीन महत्वपूर्ण समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार हर जिले और विधानसभा सीट के जातीय समीकरण, संगठन की वास्तविक स्थिति और जीत की संभावना (विनेबिलिटी) का बारीक विश्लेषण कर रहे हैं। अखिलेश यादव की रणनीति पूरी तरह साफ नजर आ रही है—सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीत की गारंटी सबसे ज्यादा मायने रखती है। सपा का स्पष्ट संदेश है कि केवल ऐतिहासिक उपस्थिति के आधार पर सीटें नहीं बांटी जा सकतीं। इसी क्रम में सपा नेतृत्व ने कांग्रेस से संभावित सीटों के साथ-साथ उन पर चुनाव लड़ने वाले मजबूत चेहरों की सूची और संगठनात्मक ढांचे का ब्योरा भी मांगा है, ताकि चुनावी मैदान में भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सके और बाद में टिकट वितरण को लेकर बगावत न फैले।

रायबरेली और अमेठी में पेंच, सपा केवल एक-एक सीट देने के मूड में सीटों के इस पूरे गुणा-गणित में सबसे पेचीदा स्थिति गांधी परिवार के प्रभाव वाले गढ़ यानी रायबरेली और अमेठी में बनती दिख रही है। कांग्रेस इन दोनों जिलों की अधिकांश विधानसभा सीटों पर अपना स्वाभाविक दावा मानती है। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल कर रख दिया था। उस चुनाव में कांग्रेस इन दोनों जिलों की किसी भी सीट पर खाता नहीं खोल पाई थी, जबकि समाजवादी पार्टी ने रायबरेली की 4 और अमेठी की 2 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। सूत्रों का कहना है कि सपा इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों की पांच-पांच विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ एक-एक सीट देने के विकल्प पर विचार कर रही है, जो कांग्रेस के लिए स्वीकार करना बेहद असहज हो सकता है।

शहरी सीटों पर कांग्रेस को आगे करने का सपा का दांव सपा नेतृत्व कांग्रेस को बड़े पैमाने पर शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर उतारने की रणनीति बना रहा है। लखनऊ, कानपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी जैसे प्रमुख नगरीय केंद्रों में कांग्रेस की दावेदारी पर विचार हो रहा है। सपा का मानना है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस का पारंपरिक शहरी वोट बैंक और मध्यम वर्ग के बीच की पकड़ गठबंधन को बढ़त दिला सकती है। इसके अलावा लखीमपुर, बाराबंकी, जौनपुर, सहारनपुर, प्रतापगढ़, हाथरस, महाराजगंज और गोंडा जैसे जिलों की चुनिंदा सीटों पर भी कांग्रेस के पुराने संगठन के आधार पर बातचीत आगे बढ़ रही है।

2017 का 105 सीटों वाला फॉर्मूला और 7 सीटों का कड़वा सच कांग्रेस अपनी 105 सीटों की मांग को सही ठहराने के लिए 2017 के विधानसभा चुनाव के सीट शेयरिंग समझौते की याद दिला रही है। उस समय ‘यूपी के दो लड़के’ के नारे के साथ दोनों दलों ने हाथ मिलाया था और कांग्रेस 105 सीटों पर मैदान में उतरी थी। हालांकि, चुनावी नतीजों में कांग्रेस सिमटकर महज 7 सीटों पर रह गई थी। समाजवादी पार्टी अब इसी कमजोर स्ट्राइक रेट को ढाल बनाकर कांग्रेस के 105 सीटों के दावे को खारिज करने की मुद्रा में है। सपा का तर्क है कि बीते वर्षों में यूपी का राजनीतिक परिदृश्य और धरातलीय समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं, ऐसे में केवल ‘विनिंग पोटेंशियल’ वाली सीटों पर ही समझौता संभव होगा।

 

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