नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता एक नए विवाद के घेरे में आ गई है। व्हाइट हाउस में ट्रंप द्वारा किए गए ‘यूरेनियम समझौते’ के दावे को ईरान ने सिरे से खारिज करते हुए इसे पूरी तरह “झूठ” करार दिया है। तेहरान की ओर से आए कड़े रुख ने उन अटकलों पर विराम लगा दिया है जिनमें एक ऐतिहासिक सफलता की उम्मीद जताई जा रही थी।
ट्रंप का दावा: ईरान अमेरिका को देगा ‘न्यूक्लियर डस्ट’
मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देश एक ऐतिहासिक शांति समझौते के बेहद करीब हैं। उन्होंने उत्साह जताते हुए कहा कि ईरान अपना यूरेनियम (न्यूक्लियर डस्ट) अमेरिका को सौंपने के लिए तैयार हो गया है। ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया कि इस डील के हस्ताक्षर समारोह के लिए वे पाकिस्तान का दौरा भी कर सकते हैं। उनका मानना है कि इस समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पूरी तरह खुल जाएगा, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई सामान्य हो सकेगी।
ईरान का पलटवार: “एक मुट्ठी यूरेनियम भी नहीं मिलेगा”
ट्रंप के इन बयानों पर ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर कालिबाफ के करीबी सूत्रों और आधिकारिक अधिकारियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने स्पष्ट किया कि:
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यूरेनियम सौंपने के विषय पर अब तक कोई ठोस बातचीत नहीं हुई है।
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वार्ता में फिलहाल कोई बड़ा ‘ब्रेकथ्रू’ या सफलता हाथ नहीं लगी है।
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भविष्य की बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका ईरान की सभी शर्तों को स्वीकार करेगा।
विवाद की असली वजह: 5 साल बनाम 20 साल
इस पूरे विवाद की जड़ परमाणु कार्यक्रम की समयसीमा पर अटकी है। पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच करीब 21 घंटे तक मैराथन बैठक चली, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। मुख्य मतभेद निम्नलिखित बिंदुओं पर हैं:
| मुद्दा | अमेरिका का प्रस्ताव | ईरान का पक्ष |
| संवर्धन पर रोक | अगले 20 वर्षों तक रोक | केवल 5 वर्षों के लिए तैयार |
| हथियार नीति | कभी भी परमाणु हथियार न बनाने की स्थायी गारंटी | अपनी शर्तों पर तकनीकी विकास का अधिकार |
आगे क्या? अनिश्चितता के बादल
डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी ‘अस्थायी’ समझौते के पक्ष में नहीं हैं और ईरान को परमाणु हथियारों से दूर रखने के लिए स्थायी प्रतिबंध चाहते हैं। दूसरी ओर, ईरान ने साफ कर दिया है कि वह ट्रंप के बयानों को केवल एक ‘राजनीतिक नैरेटिव’ मानता है। दोनों देशों के बयानों में यह भारी अंतर संकेत दे रहा है कि शांति की राह अभी भी बहुत कठिन है।
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